सद्भावना सम्मेलन में गूंजा विश्व शांति और सद्भावना का शंखनाद*: *पुलक-पुलक उठी देवभूमि, देश-विदेश के श्रद्धालुओं ने लिया दिव्य सत्संग का लाभ*


*हरिद्वार,14 अप्रैल। बैसाखी महोत्सव के पावन अवसर पर मानव उत्थान सेवा समिति द्वारा आयोजित त्रि-दिवसीय ‘सद्भावना सम्मेलन’ के दूसरे दिन आज हरिद्वार के ऋषिकुल कॉलेज ग्राउंड में आस्था और अनुशासन का एक अद्भुत संगम देखने को मिला। जहाँ एक ओर विश्व के कई हिस्सों में अशांति और तनाव का माहौल है, वहीं हरिद्वार की इस पवित्र भूमि पर उमड़ा जनसैलाब पूरी दुनिया को ‘शांति और सद्भाव’ का संदेश दे रहा है।
*शांति का वैश्विक केंद्र बना सम्मेलन*
आज सम्मेलन के दूसरे दिन देश के कोने-कोने के साथ-साथ विदेशों से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। भारी भीड़ के बावजूद कार्यक्रम में दिखा अनुशासन यह सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक चेतना से ही समाज में व्यवस्था और शांति स्थापित की जा सकती है।
*भारतरत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जन्म दिन पर*
भारतीय संविधान के निर्माता शिल्पकार भारतरत्न बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर जी के जन्मदिन दिवस आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं!
14 अप्रैल, 1891 को महू में जन्मे एक बालक डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने अपनी कलम और संघर्ष से पूरे देश की तकदीर लिख दी।
बचपन में ‘अछूत’ कहकर स्कूल में अलग बिठाया गया। पानी पीने तक की मनाही थी। लेकिन बाबासाहेब ने अपमान को अपनी ताकत बनाया।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में पीएचडी, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डीएससी–उस दौर में दो-दो डॉक्टरेट।
उन्होंने साबित किया कि प्रतिभा जाति नहीं देखती, अवसर देखती है।
बाबासाहेब 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने। 2 साल 11 महीने 18 दिन में दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान दिया।
बाबासाहेब का संविधान सिर्फ कानून की किताब नहीं है। यह 140 करोड़ लोगों का सामाजिक अनुबंध है।
डॉ.भीमराव अम्बेडकर जी ने कहा था “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”
वह मानते थे कि शिक्षा शेरनी का दूध है, जो पिएगा वो दहाड़ेगा। आज बेटियां IIT-IIM में टॉप कर रही हैं। यह उनका ही सपने था।
समान नागरिक संहिता (UCC) जिसे उत्तराखंड सरकार ने सबसे पहले लागू किया है। उन्ही के द्वारा संविधान में प्रदत्त एक कानून है।
बाबासाहेब ने कहा था– “मैं उस धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है।”
श्री महाराज जी ने उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा कि आज की विषम परिस्थितियों में पूरी दुनिया को सद्भावना की अत्यंत आवश्यकता है और यह सम्मेलन उसी दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो रहा है।
महाराज श्री एवं दिव्य विभूतियों का भव्य स्वागत
कार्यक्रम का शुभारंभ पूज्य श्री सतपाल जी महाराज एवं अन्य दिव्य विभूतियों के मंच आगमन के साथ हुआ। मानव उत्थान सेवा समिति के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने महाराज श्री का भव्य स्वागत एवं अभिनंदन किया। इस दौरान कार्यक्रम में अतिथि के तौर पर पधारे श्री हेमंत द्वीवेदीजी(अध्यक्ष-बद्रीनाथ, केदारनाथ मंदिर समिति), श्री द्रोण गुलाटी जी(मैंनेजिंग डायरेक्टर-एलोराज मेल्टिंग मोमेंट्स), डॉ.श्री लोकेश ओहरी जी(मानव वैज्ञानिक और फ़िल्म मेकर) का स्वागत पूज्य श्री महाराज जी, श्री विभु जी महाराज और श्री सुयश जी महाराज द्वारा मोमेंटो, अंग वस्त्र और पुष्प-गुच्छ देकर स्वागत किया गया। आश्रम के सेवादारों और स्थानीय पदाधिकारियों ने महाराज जी को पुष्प-गुच्छ और मालाएं भेंट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।
*महाराज श्री का दिव्य संदेश:*
“मानव धर्म ही विश्व शांति का आधार”
सम्मेलन के मुख्य आकर्षण पूज्य श्री सतपाल जी महाराज ने अपने सारगर्भित प्रवचनों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। महाराज जी ने वर्तमान समय की चुनौतियों और आध्यात्मिक समाधान पर प्रकाश डालते हुए कहा:
“आज मनुष्य बाहर की दुनिया में शांति खोज रहा है, जबकि वास्तविक शांति उसके स्वयं के भीतर स्थित है। जब तक मनुष्य का मन शांत नहीं होगा, तब तक विश्व में शांति की कल्पना करना व्यर्थ है। सद्भावना का अर्थ केवल साथ बैठना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति प्रेम और आत्मिक भाव रखना है।”
*पूज्य श्री सतपाल जी महाराज का दिव्य और सामाजिक समरसता संदेश:* सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण ही सच्चा धर्म
हरिद्वार के पावन तट पर आयोजित ‘सद्भावना सम्मेलन’ के दिव्य मंच से पूज्य श्री सतपाल जी महाराज ने मानवता, पर्यावरण और राष्ट्रभक्ति के प्रति एक जागृत आह्वान किया। उनके प्रवचन में पंच परिवर्तन सहित मुख्य अंश निम्नलिखित हैं:
*१. सामाजिक समरसता*
महाराज जी ने समाज में व्याप्त भेदभाव को मिटाने पर जोर देते हुए कहा, “हमें सामाजिक समरसता (Social Harmony) को अपने जीवन में उतारना होगा। जाति, पंथ और भाषा के भेदों को भुलाकर मंदिर, पानी और श्मशान को सभी के लिए सुलभ बनाना होगा।” उन्होंने स्पष्ट किया कि हम सभी पहले मानव हैं और मानवता ही हमारा मूल धर्म है।
*२.कुटुंब प्रबोधन*-
वर्तमान तकनीकी युग में बिखरते परिवारों पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने ‘कुटुंब प्रबोधन’ की बात की। महाराज जी ने कहा कि नई पीढ़ी को नैतिक मूल्य और संस्कार सिखाना अनिवार्य है। चाहे हम कितनी भी प्रगति कर लें, यदि पारिवारिक रिश्ते मजबूत नहीं होंगे, तो समाज का आधार कमजोर बना रहेगा।
*३. पर्यावरण संरक्षण:* ‘प्लास्टिक मुक्त भारत’ का संकल्प
पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए महाराज जी ने कहा कि आज नदियाँ और जीव-जंतु प्लास्टिक के प्रदूषण से कराह रहे हैं। उन्होंने भक्तों से आह्वान किया कि:
• प्लास्टिक का पूर्ण बहिष्कार करें।
• पानी का सदुपयोग करें और वृक्षारोपण को बढ़ावा दें।
• देवभूमि और अपनी धरती को स्वच्छ और पवित्र रखें।
*४. स्वदेशी*- राष्ट्रभक्ति और आत्मनिर्भरता,
महाराज जी ने ‘वोकल फॉर लोकल’ का मंत्र देते हुए स्थानीय व्यवसायों, विशेषकर पहाड़ी उत्पादों (हल्दी, मसाले, चटनी) को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने उत्तराखंड के विकास कार्यों, जैसे सड़कों के नेटवर्क विस्तार और चारधाम यात्रा के सुदृढ़ीकरण की सराहना करते हुए कहा कि हमें राष्ट्रहित में सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहिए।
*५. नागरिक कर्तव्य* विश्व शांति के लिए मानसिक तैयारी
वैश्विक अशांति और युद्धों के संदर्भ में महाराज जी ने कहा कि हमें किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल शब्दों में नहीं, बल्कि देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने में है।
“सद्भावना सम्मेलन का यह विशाल जनसमूह इस बात का प्रमाण है कि शांति और प्रेम ही विश्व को जोड़ने का एकमात्र मार्ग है।”
*समिति की व्यवस्थाओं की सराहना*
मानव उत्थान सेवा समिति द्वारा श्रद्धालुओं के लिए आवास, भोजन और सुरक्षा की व्यापक व्यवस्था की गई है। श्री प्रेमनगर आश्रम के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में हज़ारों स्वयंसेवक दिन-रात सेवा में जुटे हैं। सम्मेलन का अनुशासन देखकर प्रशासन और स्थानीय नागरिक भी प्रभावित दिखे।
आयोजकों ने सभी धर्मप्रेमियों से इस आध्यात्मिक गंगा में डुबकी लगाने का सादर आह्वान किया है। मंच संचालन डॉ. संतोष यादव ने किया।
