पहाड़ों की विलुप्त होती प्रथाएं होंगी पुनर्जीवित, ग्राम सोन्नी में जेष्ठ संक्रांति को काटा जाएगा संकट मोचन रोट
अपने कुल देवता, ग्राम देवता, इष्ट देवता एवं स्थानीय अन्य देवों के पूजन अर्चन के बाद गांव की सुख शांति और संकट निवारण के लिए उत्तराखंड सहित कई पहाड़ी राज्यों में रोट काटने की एक पवित्र अनुष्ठान क्रिया है। रोट रोटी के ही शाब्दिक अर्थ में प्रयुक्त होता है जो उसका पुलिंग है। किंतु इसकी बनाने की विधि एकदम भिन्न है। गुड़ की कुछ मात्रा गर्म करके उसकी चासनी बनाई जाती है उसमें सौंप इलायची आदि मिलाकर गेहूं का मोटा दरदरा आटा घी सहित गूंदा जाता है। फिर पत्थर की शिला में या तवे में इसको दोनों ओर से खूब तपाया पकाया जाता है। रोटी की भांति इसे अंगारों में नहीं पकाया जाता।
पकाने के बाद विधि विधान से देवता को भोग लगाया जाता है और फिर इसके टुकड़ों को उपस्थित जनों एवं समस्त गांव वालों को बांटा जाता है। जिस पुरुष स्त्री पर देव अवतरित होते हैं वे देवस्वरूप में इस रोट के कुछ हिस्सों को चारों दिशाओं में अलायें बलायें रोकने के लिए भी फेंक देते हैं। गांव में पहले यह प्रथा थी की हर घर से निर्धारित मात्रा में आटा गुड़ घी आदि बराबर संग्रहित किया जाएगा और तब यह पूजन कार्य सम्पन्न किया जायेगा।
हमारे गांव सोन्नी, पट्टी कड़ाकोट पोस्ट ऑफिस सिल्काखाल टिहरी गढ़वाल में यह परम्परा लगभग अनवरत चली आ रही है और गत वर्षो की भांति इस वर्ष भी जेष्ठ संक्रांति 14-मई के दिन यह रोट काटने का अनुष्ठान संपन्न किया जाएगा। यह अनुष्ठान गांव के ठीक मध्य भाग घंडियाल देव के मंदिर में संपन्न किया जाएगा। तदनंतर सोन्नी विकास ट्रस्ट के दिवंगत अध्यक्ष स्वर्गीय श्री जेपी जोशी की श्रद्धांजलि और सम्मान में अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।
सूत्र -श्री दौलत राम जोशी, सचिव सोन्नी ग्राम विकास ट्रस्ट
डॉक्टर हरिनारायण जोशी अंजान
