शिकायत से ‘रज़ा’ तक का सफर: कर्मों की स्वीकार्यता में ही छिपा है परमानंद
सृष्टि का दैवीय खेल स्त्री और पुरुष: शरीर का फर्क, आत्मा का नहीं
पुरुष और स्त्री – ये हैं क्या? पहले तो ये समझना है कि स्त्री और पुरुष हैं कौन? इस पूरी रचना को किसने बनाया? हर चीज़ किसी ने बनाई है ना? बनाने वाला वो एक ही है। तुम उसे गॉड, भगवान या ईश्वर कोई भी नाम दे दो। ये संसार परमात्मा के द्वारा, खेल के लिए बनाया गया था। परमात्मा ने अपना ही रूप तुम्हारे को दिया और तुमसे कहा कि तुम संसार में जाकर घूमो- फिरो और अपने असली घर (परमात्मा के घर) लौट आओ। जब तुम लौटे नहीं, तो परम माँ, परम बाप दुखी हो गए। फिर अंत में माँ बाप क्या कहते हैं? ‘तुम्हें शर्म ही नहीं है, बेशर्म’! तब उन्होंने तुम्हारे लिए सज़ाओं का दौर शुरू किया। और वो सज़ाएँ बढ़ते-बढ़ते आज करोड़ों साल के बाद ऐसी हो गई हैं कि तुम इस धरती (मृत्युलोक) पर फँसे हुए हो। चौरासी लाख योनियाँ, यानी चौरासी लाख मौत की सज़ाएँ हैं तुम्हारे लिए! सारे ग्रंथ और सारे शास्त्र यही कह रहे हैंI पहले उसने एक ही इंसान बनाया। फिर उसने सोचा कि ये अकेला बोर (bore) हो रहा है, तो उसने फिर दूसरा बनाया! परमात्मा ने फ़र्क क्या डाला? सिर्फ एक क्रोमोसोम (chromosome) को हटा दिया! तुमने साइंस में 23 और 24 क्रोमोसोमस के बारे में पढ़ा है। यानी हर स्त्री के अंदर 90% पुरुष है और हर पुरुष के अंदर 90% स्त्री है; सिर्फ दस परसेंट का फ़र्क है। परमात्मा ने सिर्फ एक हिस्से को हटाया और पूरे शरीर की रचना बदल गई, जिससे अट्रैक्शन (attraction) शुरू हो गया! अब एक पुरुष और एक स्त्री के बनते ही मायूसी ख़त्म हो गई। फिर उन्होंने पूरी सृष्टि को दो में बदल दिया, पुरुष और स्त्री। हर पुरुष स्त्री ही है, यहाँ पूर्ण रूप से पुरुष कोई होता ही नहीं है। फ़र्क सिर्फ इतना है कि संसार के अंदर और शरीर के अंदर, इस खेल को चलाने के लिए परमात्मा ने दो हिस्से बाँटे; एक को ताकत दी और एक को कोमल बनाया। एक को गर्भ दिया कि वो बच्चों को जन्म दे, उनकी परवरिश करे, नई जिंदगी को संसार में लाए और गृहस्थी संभाले। स्त्री को सेवा का काम दिया गया और पुरुष को श्रम का, कि वो बाहर का काम करे। ये जिंदगी को बैलेंस करने के लिए किया गया था। करुणा, मुदिता, मैत्री और धीरज, ये परमात्मा के चार लक्षण हैं। ध्यान रखना! जो परमात्मा हो गए, उनके ये चार ही लक्षण होते हैं, सिर्फ चार। जो भगवान हैं, उसके ये चार गुण हैं। गौतम बुद्ध, महावीर, जीसस, गुरु नानक देव, रामकृष्ण परमहंस, कबीर, फरीद ,साईं-बाबा, मीरा बाई, सहजो बाई और लल्ला बाई, ये सब भगवान जैसे हो गए। ये सब स्त्री हो गए क्योंकि स्त्री के ये चार लक्षण होते हैं। ये चार लक्षण जिसमें भी आ गए, वो परमात्मा हो गया। करुणा क्या है? करूणा, जिसको तुम दया कहते हो। पुरुष से ज्यादा स्त्री को दया आती है। परमात्मा कहता है कि सब अपने पिछले जन्म के संचयित कर्मों और इच्छाओं के कारण ये जन्म लेकर आए हैं। वो कहता है कि तुम कौन होते हो किसी पर दया करने वाले? करुणा और दया में फ़र्क है; करुणा परमात्मा का गुण है और दया औरत का गुण है। स्त्री की दया को करुणा में बदलना है। पुरुष के अंदर अहंकार है, इसलिए पुरुष संसार के अंदर अहंकार से भरा होता है। स्त्री के पास सिर्फ ममता होती है। स्त्री परमात्मा तक नहीं पहुँच पाती क्योंकि बच्चा उसकी रुकावट बन जाता है। पुरुष परमात्मा तक नहीं पहुँचता क्योंकि उसका अहंकार उसकी रुकावट है। दोनों में यही एक बड़ी कमी है। स्त्री के पास बहुत धीरज है, तभी तो आज तक वो गुलामी कर रही है। जो स्त्रियां बेचारी नौकरियाँ नहीं कर पा रही हैं, उनको पुरूष की गुलामी करनी पड़ रही है! अगर तुम आज किसी पर अत्याचार कर रहे हो, तो कल तुम स्त्री बनोगे;आज जो स्त्री है वो कल पुरुष ही थी, ध्यान रखना! इसलिए मैं स्त्री से फिर कहता हूँ, “तुम रिलैक्स में होकर इसे सहन कर लो, दुखी मत होना, क्योंकि ये तुम्हारे पिछले जन्म के कर्म हैं। तुमने पहले ऐसा किया होगा, इसलिए आज वो तुम्हारे साथ ऐसा कर रहा है”। मज़े की बात है कि जैसे ही तुम हुक्म (रज़ा) में आते हो और शिकायत करना छोड़ देते हो, तब तुम्हारी आनंद की स्थिति बनने लग जाती है, और आनंद ही परमानंद है,आनंद ही परमात्मा है। स्त्री के ये चार गुण- करुणा, मुदिता, मैत्री और धीरज ही उसे परमात्मा से मिला सकते हैं, क्योंकि वो भक्ति मार्ग पर चलती है, प्रेम में आ जाती है। इसलिए बाहर गृहस्थ और अंदर वानप्रस्थ हो जाना है। माया को जलाना है और भक्त हो जाना है।
