बद्रीनाथ क्षेत्र का प्रसिद्ध गाँव माणा

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डॉ रमेश खन्ना
वरिष्ठ पत्रकार
बद्रीनाथ क्षेत्र के प्रसिद्ध गाँव माणा में सबसे पहले बसने वाले लोग भोटिया जनजाति के ‘मरछा’ समुदाय के थे। यह गाँव उत्तराखंड पर्यटन के अनुसार समुद्र तल से लगभग 3,219 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, जिसे अब “भारत का पहला गाँव” कहा जाता है।सदियों पहले विपरीत परिस्थितियों में यहाँ आकर बसे इन लोगों का इतिहास, रहन-सहन और खान-पान बेहद अनूठा रहा है ये लोग कहाँ से आए थे? (मूल और इतिहास)मंगोलियाई और तिब्बती मूल माणा के निवासियों का ऐतिहासिक संबंध मंगोल जनजातियों से माना जाता है। सांस्कृतिक रूप से इनका जुड़ाव तिब्बत और भारत दोनों से रहा है।स्थानीय मान्यता गाँव के भीतर कई उप-जातियाँ हैं, जिनमें से ‘मोलफा’ जाति के लोगों को माणा का सबसे मूल निवासी माना जाता है। ये लोग सदियों पहले भारत-तिब्बत व्यापार के उद्देश्य से और पहाड़ों की दुर्गम सुरक्षा को देखते हुए इस घाटी में आकर बस गए थे। (भौगोलिक चुनौतियाँ)ये लोग अत्यधिक कठिन में रहते घुमंतू या अर्ध-यायावरअत्यधिक ठंड के कारण ये लोग साल के केवल 6 महीने (मई से अक्टूबर) ही माणा में रह पाते थे। जब नवंबर में भारी बर्फबारी शुरू होती और बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद हो जाते, तो पूरा गाँव खाली हो जाता था। ये लोग अपने पशुओं के साथ नीचे के कम ठंडे इलाकों जैसे चमोली, जोशीमठ और गोपेश्वर में चले जाते थे 1962 के भारत-चीन युद्ध से पहले, इन लोगों का मुख्य जीवन आधार तिब्बत के साथ व्यापार था। ये ऊन, सुहागा और नमक का व्यापार करने के लिए दुर्गम पहाड़ी दर्रों से होकर तिब्बत जाते थे।रहन-सहन की व्यवस्था कैसी थी यहाँ के घर ढलान वाली पहाड़ियों पर पत्थर की दीवारों, मिट्टी के लेप और स्लेट की छतों से बनाए जाते थे। इनमें लकड़ी की खिड़कियों पर खूबसूरत नक्काशी होती थी। घर इस तरह बनाए जाते थे कि वे भूकंप के झटके झेल सकें और अंदर से गर्म रहें कड़ाके की ठंड से बचने के लिए परिवार की महिलाएं भेड़ की ऊन से कालीन, शॉल, टोपी और पंखी (पतले ऊनी कंबल) खुद बुनती थीं। पुरुष और महिलाएं दोनों पारंपरिक ऊनी वस्त्र पहनते थे।इनका जीवन बद्रीनाथ मंदिर की धार्मिक गतिविधियों से गहराई से जुड़ा था। आज भी शीतकाल में मंदिर के कपाट बंद होने से पहले माणा गाँव की कुंवारी लड़कियों द्वारा बुना गया ऊनी चोगा (शॉल) ही भगवान बद्रीविशाल को ओढ़ाया जाता है।खान-पान की व्यवस्था कैसी थी कठिन मौसम के कारण यहाँ ताजी सब्जियों का मिलना बहुत मुश्किल था, इसलिए इनका खान-पान स्थानीय रूप से उगाई जाने वाली और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाली चीजों पर निर्भर थाशये अपने छोटे-छोटे बगीचों में आलू, राजमा (किडनी बीन्स), पालक और बंदगोभी उगाते थे। यहाँ का आलू और राजमा आज भी बहुत प्रसिद्ध है।
भोजन में मुख्य रूप से जौ, फाफर (ओगल) और मंडुआ (रागी) जैसे मोटे अनाजों का उपयोग सत्तू या रोटी के रूप में होता था, जो शरीर को अत्यधिक ऊर्जा और गर्मी देते थे।नमकीन चाय (ज्या) यहाँ तिब्बती संस्कृति से प्रभावित एक विशेष प्रकार की चाय पी जाती थी, जिसे ‘ज्या’ कहा जाता है। इसे चायपत्ती, मक्खन, नमक और दूध को एक विशेष लकड़ी के बर्तन में मथकर बनाया जाता था, जो ठंड में होठों को फटने से बचाती थी और शरीर को गर्म रखती थी।सर्दियों के लिए ये सब्जियों और कुछ वनस्पतियों को सुखाकर रख लेते थे ताकि बर्फबारी के दौरान भोजन की कमी न हो।

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