महात्मा गांधी जयंती : क्यों महात्मा और परमात्मा में अंतर रह गया?
महात्मा गांधी और महावीर स्वामी दोनों ने ‘अहिंसा’ अपनाई, पर दोनों की अहिंसा में भेद है। एक महात्मा कहलाए और एक परमात्मा हो गए। महात्मा गांधी अभी हाल ही में आए और महावीर स्वामी पच्चीस सौ साल पहले आए। कुदरत का कुछ ऐसा मिलाप है कि दोनों खेल गुजरात से शुरू हुए; महात्मा गांधी गुजरात से थे और महावीर स्वामी के जैन धर्म के ज़्यादातर लोग गुजरात में हैं। माया का चयन करने के लिए महात्मा गांधी की फोटो हर नोट पर दर्ज करवाई गई, ताकि वो मान्य माना जाए और फोटो न हो, तो नोट नकली। क्या किया था महात्मा गांधी ने? उनका मुख्य सिद्धांत ‘अहिंसा’ था। उन्होंने आवाज़ उठाई ताकि गुलामी का बंधन टूट सके, पर जब आवाज़ उठाई तो अंग्रेज़ों ने अत्याचार किए। जब कोई मारता है तो सामने वाला भी मारता है, तो क्या गलत किया? एक को ज़्यादा और एक को कम लगती है, और बंदूक और लाठी में बंदूक की ही विजय होती है।
महात्मा गांधी ने देखा की अंग्रेज़ हावी हैं। महावीर स्वामी से प्रेरित होकर महात्मा गांधी ने ‘अहिंसा’ शब्द को चुना, क्योंकि उन्होंने जाना कि महावीर स्वामी पर इतने अत्याचार हुए और उन्होंने कभी भी अत्याचार का जवाब अत्याचार से नहीं दिया। किसी ने उनको पत्थर मारे तो उन्होंने वापस मारने के लिए पत्थर नहीं उठाए। महात्मा गांधी पश्चिम से पढ़कर आए थे, इसलिए जीसस का भी प्रभाव था कि कोई एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर दो कि मारो मुझे, कितना मारना है।
महात्मा गांधी ने कहा कि अंग्रेजों के पास हथियार हैं, जो हमको खत्म कर सकते हैं, और अंग्रेजों में भी आत्मा है। इसलिए उन्होंने ‘अहिंसा’ को अंग्रेजों पर लागू किया। एक इंसान किसी पर कितनी ज़्यादती करेगा, इसलिए बेहतर है कि हम हथियार उठाएँ ही नहीं; उन्हें मारने दो जितना मारते हैं। उनकी बहिर्मुखी हिंसा का जवाब नहीं देना है, मौन हो जाओ और देखते हैं कि वो कितने लोगों को मारेंगे। कोई कितना भी अत्याचार करे, अगर तुम मौन हो और प्रतिक्रिया नहीं देते, तो सौ प्रतिशत वो इंसान कितना भी गिरा हुआ हो, एक दिन तुम्हारे चरणों में गिरेगा। यही है ‘अहिंसा’।
महात्मा गांधी ने कहा, “भारतवासियों! शहीद होने को तैयार हो जाओ, अब समय आ गया है – मौत या आज़ादी। हमारे पास एक ही हथियार है, अहिंसा, ‘अहिंसा परमो धर्म’।” आखिरी में अंग्रेज़ थक गए, उनकी भी रूह काँप गई, और देश आज़ाद हो गया। अहिंसा से महात्मा गांधी ने देश को स्वतंत्र करवाया। उसी अहिंसा के लिए संत रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी थी। महात्मा यानी महान आत्मा। महान आत्मा इसलिए क्योंकि अगर उन्होंने अपने जीवन में अहिंसा नहीं अपनाई होती तो न जाने स्वतंत्रता कितनी दूर होती। शरीर पर पूरे कपड़े नहीं, हाथ में लकड़ी, और भारत को आज़ाद करवा दिया। फिर ‘फादर ऑफ द नेशन’ घोषित हुए।
अहिंसा से महावीर स्वामी परमात्मा हुए, पर गांधी महात्मा क्यों रहे, परमात्मा क्यों नहीं हुए? महावीर स्वामी को परमात्मा कह दिया, वो पूजे जाते हैं। उनके साथ एक नई धारा बही, और सबने अपने को ‘जैन’ कह दिया, यानी महावीर स्वामी के वंश से जुड़ गए। करोड़ों का परिवार बन गया। महात्मा गांधी का करोड़ों का परिवार नहीं बना, तो कहाँ चूक हो गई? महावीर स्वामी की अहिंसा में न बहिरात्मा थी, न अंतरात्मा; वो दोनों के पार थे, इसलिए परमात्मा कहलाए। महावीर स्वामी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि बाहर संसार में क्या हो रहा है। वो बहिर्मुखी होकर अपना संदेश देते जा रहे थे, पर अंतर्मुखी रूप से कहीं पर भी अटैच नहीं थे कि जो मैं चाहता हूँ वैसा ही हो। अंदर उनका रिलैक्स बना हुआ था।
महात्मा गांधी की अहिंसा बहिर्मुखी से अंतर्मुखी और अंतर्मुखी से बहिर्मुखी गई, पर दोनों के पार न पहुँच सकी। देश की आज़ादी के लिए आसक्ति आ गई। अहिंसा को अपनाया, पर कुर्सी का लालच नहीं था, इसलिए अंतर्मुखी भी हुए। पर फिर बहिर्मुखी हो गए कि मुझे लोगों को खुश देखना है, देश आज़ाद हो जाए। कहीं न कहीं अटक गए। देश का, न चाहते हुए भी, बँटवारा हुआ। उन्होंने कहा कि यह गलत है, पर अलगाव हुआ और उसी में उन्होंने अपने प्राण भी खो दिए। अलगाव हुआ तो दुखी हो गए। ऐसे दुखी हुए कि लोगों को मनाने के लिए अनशन अपनाया कि मानो, नहीं तो मैं मर जाऊँगा। महात्मा गांधी के भाव नहीं गए, वो आसक्त होकर दुखी हो गए। वे अनासक्त न हो सके, इसलिए महात्मा रह गए, परमात्मा न हो सके; यही भेद रह गया।
