शब्दवीणा की मासिक साहित्यिक भेंटवार्ता “एक शाम साहित्य के नाम” के अगस्त अंक का हुआ आयोजन
*-आमंत्रित साहित्यकार डॉ विकास शुक्ला से वार्ताकार सरोज कुमार ने जीवन, समाज एवं साहित्य के विविध आयामों से पूछे रोचक प्रश्न*
*-सुना है शब्द हैं ब्रह्म, ये मरा नहीं करते, मैं इन शब्दों में बस कर अमर हो जाऊँगा…*
*-ये तो तुम्हारी यादें हैं, जिनके सहारे मैं ज़िंदा हूँ। तुम बिन ज़िंदा हूँ, बस इसी बात पर शर्मिंदा हूँ”*
गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ की हरियाणा प्रदेश समिति एवं फरीदाबाद जिला समिति द्वारा हर माह नियमित रूप से आयोजित होने वाली भेंटवार्ता “*एक शाम साहित्य के नाम*” के अगस्त माह के अंक में आमंत्रित साहित्यकार के रूप में कवि व साहित्यकार तथा शब्दवीणा फरीदाबाद जिला समिति के कोषाध्यक्ष डॉ विकास शुक्ला रहे। डॉ विकास शुक्ला जापानी बहुराष्ट्रीय कंपनी सोज़ीत्ज़ में वरिष्ठ प्रबंधकीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए 2002 से साहित्य की साधना में रत हैं। वार्ताकार के रूप में कार्यक्रम की संयोजिका एवं शब्दवीणा हरियाणा प्रदेश सचिव वरिष्ठ कवयित्री सरोज कुमार रहीं। शब्दवीणा की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डॉ रश्मि प्रियदर्शनी एवं श्रीमती सरोज कुमार ने डॉ विकास शुक्ला का शब्दवीणा के मंच पर हार्दिक अभिनंदन किया।
श्रीमती सरोज ने डॉ विकास शुक्ला का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय देते हुए, उनसे उनके पारिवारिक व साहित्यिक पृष्ठभूमि पर बातचीत की। डॉ शुक्ला ने प्रयागराज की सरलता की प्रशंसा करते हुए उसे साहित्यिक सृजन की दृष्टि से बड़ा ही सुंदर स्थान बताया। डॉ शुक्ला द्वारा फूल एवं पत्थर पर रखे जा रहे विचारों के संदर्भ में श्रीमती सरोज ने अपनी पंक्तियाँ “पत्थरों से खेलने का शौक ओ मेरे सनम, हमने नहीं पाला। फूल ही फेंकेंगे सदा यदि कभी अपना गुस्सा तुम पर निकाला” बड़ी ही वाकपटुता के साथ पढ़ीं। डॉ शुक्ला ने वार्ताकार श्रीमती सरोज द्वारा मनुष्य, समाज, संस्कृति, भाव, विचार, एवं साहित्य के अंतर्संबंधों पर पूछे जा रहे सभी प्रश्नों का बड़ी ही शालीनता एवं विद्वता के साथ उत्तर दिया।
डॉ शुक्ला ने कहा कि कविता केवल भावों की अभिव्यक्ति मात्र ही नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, सकारात्मकता, एवं नैतिक मूल्यों के जागरण का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कविता को जीवन के कटु एवं मधु अनुभवों को व्यक्त करने का माध्यम बतलाया। अपनी कविता “सुना है शब्द हैं ब्रह्म, ये मरा नहीं करते, मैं इन शब्दों में बस कर अमर हो जाऊँगा” द्वारा शब्दों की सृजनात्मक शक्ति पर प्रकाश डाला। “सोचता था ज़िंदगी हसीन होगी। तुम्हारे बिना भी यह रंगीन होगी, पर आलम यह है कि तुम्हारे बिना ये ज़िंदगी बोझ लगती है। कभी-कभी नहीं, हर रोज लगती है। ये तो तुम्हारी यादें हैं, जिनके सहारे मैं जिंदा हूँ। तुम बिन ज़िंदा हूँ, बस इसी बात पर शर्मिंदा हूँ” जैसी भाव-सिंचित एवं श्रृंगार रस में डूबी पंक्तियों को बड़े ही सहज भाव से प्रस्तुत किया।
डॉ विकास शुक्ला ने शब्दवीणा की देश भर में संचालित विभिन्न प्रदेश एवं जिला समितियों द्वारा किए जा रहे साहित्यिक आयोजनों की प्रशंसा करते हुए शब्दवीणा को देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थाओं में से एक बताया। उन्होंने शब्दवीणा परिवार के लिए हार्दिक शुभकामनाएं दीं। वार्ता लगभग एक घंटे तक चली।शब्दवीणा के केन्द्रीय फेसबुक पेज से साझा कार्यक्रम को देश के विभिन्न प्रदेशों से जुड़े साहित्यानुरागियों ने देखा, सुना तथा सराहा। साहित्यिक वार्ता काफी रोचक, सार्थक एवं सारगर्भित रही। कार्यक्रम से आनलाइन जुड़े सुधीर धोत्रे, अजय कुमार, डॉ विजय शंकर, प्यारचंद कुमार मोहन, पुरुषोत्तम तिवारी, अरुण अपेक्षित, ललित शंकर, डॉ रश्मि प्रियदर्शनी, सुम्मी नेथानी, डॉ वीरेंद्र कुमार, प्रतीक प्रभाकर, प्रभु दयाल खट्टर, प्रीता पँवार कौशिक, मधु वशिष्ठ, सुरेश विद्यार्थी, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, सुप्रिया आयुष ने अपनी लिखित प्रतिक्रियाओं द्वारा अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया।
