आदमखोर बाघों से मुक्ति दिलायी थी शिकारी व वन्यजीव प्रेमी जिम कार्बेट ने
महान शिकारी व वन्यजीव प्रेमी जिम कार्बेट को जयंती पर याद किया गया
मसूरी। ब्रिटिश काल के महान शिकारी व वन्य प्राणी प्रेमी, फोटोग्राफर जिम कार्बेट जिन्होंने पूरे उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों को आदमखोर बाघों से मुक्ति दिलायी थी की 151वीं जयंती पर उन्हें याद किया गया। इस मौके पर इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी व देश सहित उत्तराखंड को दिए गये योगदान के बारे में जानकारी दी।
इस मौके पर इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने बताया कि जिम कार्बेट के पिता क्रिस्टोफर कार्बेट 1822 में मेरठ में सेना में तैनात थे व पोस्ट आफिस में कार्य किया व उनका स्थानानंतरण मसूरी लंढौर पोस्ट ऑफिस में हुआ। था, उनकी पत्नी का निधन होने के बाद उन्होंने दूसरी शादी मसूरी के सेंटपॉल चर्च चारदुकान में हुई थी, उसके बाद उनका स्थानानंतरण 1868 में नैनीताल हो गया था जहंा जिम कार्बेट का जन्म 1875 में 25 जुलाई को हुआ था उनके कई रिस्तेदार मसूरी में रहते थे। उसके बाद जिम कार्बेट कई बार मसूरी आये व यहंा भी उन्होंने मसूरी देहरादून में कई नरभक्षी बाघों को मारा था। जिम कार्बेट ने उत्तराखंड के कई हिस्सों में लोगों को आदमखोर बाघों से मुक्ति दिलायी थी जिसके कारण उन्हें बड़ा शिकारी माना जाता था व लोग उनके पास अपने क्षेत्र में बाघों के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए बुलाते थे। वह वन्यजीव प्राणी भी थे व जानवरों को बहुत प्यार करते थे
उन्होंने खुद एक बाघ पाल रखा था। इसी के साथ वह बहुत अच्छे फोटोग्राफर भी थे जिन्होंने अनेक दुलर्भ चित्र खींचे साथ ही कई किताबें लिखी। उनके फोटोग्राफ व डायरी उनके पास मौजूद है साथ ही उनके जंगलों में जाने पर खाना पकाने का कुकर व लालटेन भी मेरे पास है। उसके बाद 1846 में वह अफ्रीका चले गये। जिम कार्बेट का मसूरी से बहुत लगाव था। इस मौके पर क्षेत्र पंचायत सदस्य मुलायम सिंह, बिजेंद्र पुंडीर, सुभाष भंडारी आदि मौजूद रहे।
