*शब्दवीणा सृजन त्रिविधा में अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस पर पढ़ी गईं रचनाएँ*

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*-माँ खुशबू है, माँ इत्र है, माँ शब्द संसार में सबसे पवित्र है*

*-तपस्या, प्रेम, ममता, स्नेह का आगार होती माँ*

*-माँ तुम्हारा नाम लिखूं मैं कैसे, और कैसे सिर्फ एक दिन?*

*-माँ, मैं नहीं चाहता कि आप सिर्फ और सिर्फ पराठे बनाओ, आप लिखो, बहुत लिखो…*

गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ द्वारा आयोजित होने वाले साप्ताहिक कार्यक्रम शब्दवीणा सृजन त्रिविधा में देवघर, झारखंड से आमंत्रित कवि बबन बदिया, कवयित्री सोनाली भारती एवं कवयित्री सोनम झा ने 10 मई को मनाए जा रहे “अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस” पर माँ, मातृत्व, प्रकृति, घर, मातृभूमि, एवं अन्य समसामयिक विषयों पर एक से बढ़कर एक रचनाएँ पढ़ीं। कार्यक्रम का शुभारंभ कार्यक्रम की संयोजक एवं शब्दवीणा की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी ने साहित्य, संगीत और समस्त कलाओं की अधिष्ठात्री देवी माँ शारदे को समर्पित स्वरचित सरस्वती वंदना “ज्ञान दे, सुर तान दे, माँ शारदे वरदान दे” की सुमधुर प्रस्तुति से किया। कार्यक्रम का संचालन शब्दवीणा सृजन त्रिविधा प्रभारी हरियाणा की कवयित्री कीर्ति यादव ने किया। उन्होंने मंचासीन अतिथि रचनाकारों का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय देते हुए स्वागत किया।

अंतरराष्ट्रीय मातृदिवस पर शब्दवीणा देवघर जिला कोषाध्यक्ष कवि बबन बदिया ने “माँ की डाँट आरती है। माँ का चाँटा जीवन का सारथी है, माँ खुशबू है, माँ इत्र है, माँ शब्द संसार में सबसे पवित्र है” रचना प्रस्तुत की। उन्होंने अपने गीत “मैं परेशान हूँ तेरी जिद से बहुत” द्वारा संयुक्त परिवार के विखंडन पर चिंता प्रकट की। शब्दवीणा की देवघर जिला अध्यक्ष कवयित्री सोनाली भारती ने शब्दवीणा के आभासी कार्यक्रमों को घर के कामकाज में व्यस्त महिला रचनाकारों के लिए अत्यंत उपयोगी बताते हुए सभी को अंतरराष्ट्रीय मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने “माँ की महत्ता” पर प्रश्नात्मक शैली में कविता पढ़ी। कहा कि “माँ तुम्हारा नाम लिखूं मैं कैसे, और कैसे सिर्फ एक दिन? है कौन-सा वह क्षण, वह दिन, जो गुजरता है तुम्हारे बिन?” शब्दवीणा की देवघर जिला अध्यक्ष सोनम झा ने माँ प्रकृति को समर्पित रचना प्रस्तुत करते हुए कहा, “जिसे प्रकृति कहते हैं, वह उपभोग की वस्तु नहीं, वह माँ है, माँ प्रकृति”। श्रीमती झा ने “पराठे की दुनिया से अलग माँ” कविता द्वारा वर्तमान समय में रसोई की दुनिया से बाहर निकल कर संसार में अपने अस्तित्व को तलाशती हुई माँ की अभिलाषाओं का सुंदर तथा भाव पूर्ण चित्रण किया। सोनम झा ने जेंजी जेनेरेशन के बच्चों की अपनी माँ के प्रति प्रगतिशील सोच को व्यक्त करती गद्य शैली में रचित एक अत्यंत गंभीर कविता पढ़ी। कहा, “मेरा जेंजी बेटा आकर गैस बंद कर देता है…कहता है कि माँ, मैं नहीं चाहता कि आप सिर्फ और सिर्फ पराठे बनाओ। आप लिखो और बहुत लिखो।”

कार्यक्रम संचालिका कीर्ति यादव ने श्री राम पर रचित गीत “मेरे हृदय में राम, मन मंदिर में राम रे। मेरी धड़कन में उनका ही धाम रे” की सुमधुर प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का समापन डॉ रश्मि द्वारा माँ को समर्पित मुक्तक एवं शांति पाठ से हुआ। डॉ रश्मि ने “जगत-जननी, समूचे विश्व का आधार होती माँ। तपस्या, प्रेम, ममता, स्नेह का आगार होती माँ। कभी गंगा, कभी यमुना, कभी दिखती कमल जैसी। सुखद सुरलोक-सी, सौंदर्य का भण्डार होती माँ” द्वारा मातृशक्ति को नमन किया। शब्दवीणा सृजन त्रिविधा का सीधा प्रसारण शब्दवीणा केन्द्रीय पेज से किया गया, जिससे जुड़कर महावीर सिंह वीर, डॉ विजय शंकर, सुरेश गुप्ता, जैनेन्द्र कुमार मालवीय, सुरेश विद्यार्थी, पी. के. मोहन, अजय कुमार, सुनीर कुमार सिन्हा, विनोद बरबिगहिया, उचित लाल मंडल ने कार्यक्रम का आनंद उठाया और अपनी टिप्पणियों से रचनाकारों का उत्साहवर्द्धन किया।

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