*शब्दवीणा ने काव्यानुष्ठान द्वारा मेघों एवं बारिश की बूंदों का किया आह्वान*

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*-मिट्टी की सोंधी खुशबू है, अंबर में काले बादल हैं*

*-मेघा बरसो रे, बरसो रे, बरसो दुआर। सजन जाने पाएँ नहीं*

*-सूर्य धरा को धौंस दिखा, कर रहा आज मनमानी है”*

*-टप-टप करती आईं बूंदें, छत पर नाचे बरसा रानी*

*-बरसात के मौसम में हम मौज मनाएँगे*

*-बहुत सह चुके गर्मी, री बरखा रानी तू आ जा रे*

गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ ने देश में पड़ रही भीषण गर्मी के प्रकोप को देखते हुए “बरखा रानी तू आ जा रे” काव्यानुष्ठान का आयोजन किया, जिसमें शब्दवीणा की विभिन्न प्रदेश व जिला समितियों से जुड़े रचनाकारों ने गीत, ग़ज़ल, दोहे, मुक्तक एवं छंदों द्वारा मेघों एवं बारिश की बूंदों का आह्वान किया। कार्यक्रम का संयोजन शब्दवीणा की कर्नाटक प्रदेश समिति ने किया। शब्दवीणा केन्द्रीय पेज से तीन घंटे तक निर्बाध रूप से प्रसारित शब्दवीणा काव्यानुष्ठान की अध्यक्षता दिल्ली से जुड़े कवि इंदु कांत अंगीरस ने की। कार्यक्रम का संचालन शब्दवीणा की कर्नाटक प्रदेश अध्यक्ष डॉ सुनीता सैनी गुड्डी एवं कर्नाटक प्रदेश उपाध्यक्ष विजयेन्द्र सैनी ने संयुक्त रूप से किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में शब्दवीणा मध्य प्रदेश समिति के सचिव कर्नल गोपाल अश्क़ रहे।

डॉ सुनीता सैनी द्वारा प्रस्तुत माँ शारदे को समर्पित आराधना गीत एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी द्वारा प्रस्तुत शब्दवीणा गीत से काव्यानुष्ठान प्रारंभ हुआ, जिसमें बिहार से दीपक कुमार, रूबी कुमारी, अजय कुमार वैद्य, जैनेन्द्र कुमार मालवीय, सुरेश विद्यार्थी, बाल कवि सत्कृत त्रिपाठी, एवं डॉ रश्मि प्रियदर्शनी ने, मध्य प्रदेश से कर्नल गोपाल अश्क़ ने, झारखंड से डॉ विजय शंकर एवं रचना झा ने, पश्चिम बंगाल से राम नाथ बेख़बर ने, दिल्ली से इंदुकांत अंगीरस ने, कर्नाटक से निगम राज़, संध्या निगम, आनंद दाधीच दधीचि, पूनम शर्मा, डॉ सुनीता सैनी, एवं विजयेंद्र सैनी ने, उत्तर प्रदेश से मनोरमा श्रीवास्तव एवं रमेश चंद्र ने, तथा हरियाणा से सरोज कुमार ने बादल, बिजली, बारिश, मिट्टी की सोंधी खुशबू, तीखी गर्मी, किसानों की समस्याएँ, बाढ़-सूखाड़ की स्थितियों पर मनमोहक रचनाएँ पढ़ीं।

डॉ रश्मि ने “बहुत सह चुके गर्मी, री बरखा रानी तू आ जा रे। है तृषित धरा व्याकुल नदियाँ, इस जग की प्यास बुझा जा रे” गीत सुनाया, तो जैनेन्द्र कुमार मालवीय ने “सूर्य धरा को धौंस दिखा, कर रहा आज मनमानी है” गाया। आनंद दधीचि ने “बादल ने बरखा के कानों में बात बताई, बरखा रानी शरमाई”, मनोरमा श्रीवास्तव ने “गरजते मेघ घिर-घिर कर, जगाते आस धरती की”, निगम राज़ ने “प्यासी चिड़ियाँ भटके इत उत, कौन कहो जल रखवाता है” रचनाएँ सुनाकर खूब प्रशंसा पाई। नन्हे सत्कृत ने मीठी आवाज में गायत्री मंत्र एवं संस्कृत के श्लोक सुनाए। दीपक कुमार के “ओ पावस के मेघ, बूंद बरसा दे केसर”, कर्नल गोपाल अश्क़ की “मैं हूँ एक अल्हड़ बादल”, डॉ विजय शंकर के “रख धीरज कर इंतजार, मिट जाएंगे संकट हजार, उठा कांँवर, चलो देवघर”, तथा रचना झा के “वसुधा के उर में एक अनकहा-सा संगीत पला” गीतों पर खूब वाहवाहियाँ लगीं।

सरोज कुमार ने “टप-टप करती आईं बूंदें, छत पर नाचे बरसा रानी”, रूबी कुमारी ने “मेघा बरसो रे, बरसो रे, बरसो दुआर। सजन जाने पाएँ नहीं” व “ताल-तलैया, नद सूखे पड़े हैं”, संध्या निगम ने “बरसात के मौसम में हम मौज मनाएँगे। हम भीग के आए हैं, हम भीग के जाएँगे, मौसम के नशे में हम बस डूबते जाएंगे”, एवं पूनम शर्मा ने “बादल घिर आए धीरे-धीरे” गीत सुमधुर स्वर में गाए। राम नाथ बेख़बर ने गज़ल “मिट्टी की सोंधी खुशबू है, अंबर में काले बादल हैं”, विजयेन्द्र सैनी ने “रिमझिम सावन बरसे आंगन, अब तो साजन आ जा ना” एवं रमेश चंद्र ने “बीत गए बरसों, जरा दे, दे दरस रे। जरा थम के बरस रे। आज हमको पिया के घर जाना है”, सुना कर श्रोताओं का मन मोह लिया। इंदु कांत अंगीरस की “सावन की रतियों में, मत जा रे बलम छोड़ के” तथा अजय कुमार वैद्य की “सूरज की किरणों से प्यारे, धरती जब भी तपती है, मेघ सभी अंगड़ाई लेते, एवं वर्षा होती है” को मंच ने खूब सराहा।

कार्यक्रम संचालिका डॉ सुनीता सैनी ने गर्मी की प्रशंसा में गीत सुनाया “रसीले आम लेकर गर्मी आई, फिर भी किसी ने नहीं खुशी मनाई। कार्यक्रम अध्यक्ष ने सभी प्रस्तुतियों के ऊपर सारगर्भित व उत्साहवर्द्धक समीक्षात्मक टिप्पणियाँ दीं। काव्यानुष्ठान का समापन राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रश्मि प्रियदर्शनी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन एवं शांति पाठ द्वारा हुआ। शब्दवीणा केन्द्रीय पेज से जुड़ कर सुरेश विद्यार्थी, प्यारचन्द कुमार मोहन ललित शंकर, अरुण अपेक्षित, डॉ रवि प्रकाश, प्रो. सुनील कुमार उपाध्याय, आलोक कुमार, संतोष कुमार जयंत, प्रमोद कुमार, डॉ विजय शंकर, माणिक सरजोशी, सुरेश गुप्ता, बादल कुमार राय सहित अनेक काव्य प्रेमियों ने काव्यानुष्ठान का आनंद उठाया।

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