भक्त से ही भगवान का अस्तित्व है

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श्री कृष्ण-राधा का प्रेम ही है भक्ति! राधा है भक्ति! राधा शुद्ध प्रेम है। शुद्ध प्रेम भक्ति होती है और शुद्ध प्रेम का अर्थ है- जब प्रेम से वासना और कामना निकल जाती है, तब वो शुद्ध प्रेम हो जाता है। कहा जाता है कि श्री कृष्ण कि सोलह हज़ार एक सौ गोपियाँ थीं। गोपियाँ यानी भक्ति या भक्त। भक्त स्त्री भी हो सकती है और भक्त पुरुष भी हो सकता है। भक्त में कोई पुरुष और स्त्री जैसा शब्द नहीं होता। जब हम गोपियाँ कहते हैं, तो गोपियों का अर्थ स्त्री से नहीं है। गोपियों का अर्थ वो आत्माएँ हैं जो कि परमात्मा में लीन होना चाहती हैं। भक्त भगवान में लीन होना चाहता है, इसलिए भक्त ना स्त्री होता है ना पुरुष। भक्त में पुरुष और स्त्री दोनों समा जाते हैं। संसार के अंदर कहीं कहा गया है कि भक्त प्रेमिका है और परमात्मा प्रेमी है। वो आत्माएँ जो श्री कृष्ण के प्रेम में और भक्ति में डूब गईं, उन सब को गोपियाँ कहा गया और उन गोपियों में जो सर्वश्रेष्ठ थीं, उन्हें राधा कहा गया। राधा प्रेम की पराकाष्ठा थीं। जब कोई राधा हो जाएगी तो भगवान को यानी श्री कृष्ण को पा लेगी। राधा निर्वासना और निष्कामना की प्रकाष्ठा थीं, इसलिए जो भी राधा की तरह शुद्ध प्रेम में आ जाएगा यानी जो निर्वासना और निष्कामना में आ जाएगा वो श्री कृष्ण को, भगवान को पा लेगा। इसलिए, तुम्हारे अन्दर जब परमात्मा, ईश्वर के लिए प्रीत बढ़ जाएगी और जब वो सौ प्रतिशत की स्थिति में पहुँचेगी, तब तुम राधा हो जाओगे। राधा यानी जो प्रेम की धारा में बह गई, जिसको अपनी अंदर की आत्मा से प्रेम हो गया। राधा श्री कृष्ण में समा गईं ।राधा और श्री कृष्ण दो नहीं बल्कि एक हो गए। कबीर कहते हैं, “गली अति सांकरी, दो ना समायो; प्रेम पंथ ऐसो कठिन, जामें दो ना समायो।” प्रेम में सब एक हो जाता है। श्री कृष्ण में राधा समा गईं और राधा में तो श्री कृष्ण चलते ही थे, जैसे कहा गया है, “आत्मा पश्यंति आत्मा” यानि आत्मा, आत्मा से मिलकर एक हो गई। तो ये हैं राधा-कृष्ण!
तुम्हारे अंदर ही है राधा और तुम्हारे अंदर ही हैं श्री कृष्ण। राधा ही एक दिन श्री कृष्ण हो जाती है; राधा श्री कृष्ण के चरण हैं और श्री कृष्ण राधा का मुख हैं, दोनों अलग नहीं हैं। इसलिए कहा गया है कि राधा और श्री कृष्ण का रिश्ता शुद्ध प्रेम से बंधा था। शुद्ध प्रेम! जहाँ ‘मैं’ है वहाँ भक्ति परिपूर्ण नहीं होती, जहाँ परिपूर्ण भक्ति होती है, वहाँ ‘मैं’ खो जाती है; केवल ‘तू’ ही रह जाता है। इसलिए कबीर ने एक दोहे में कहा है, “जब मैं था तो हरि नहीं, अब हरि है तो मैं नहीं!” जब भक्ति आती है, तो ‘मैं’ नहीं बचती। इसलिए जब तक तुम ‘मैं-मेरा’ में फँसे हो, तब तक तुम्हारे अन्दर भक्ति नहीं आ सकती। तुम अपने अंदर से ‘मैं’ को माइनस करो यानी ‘मैं’ ‘हटेगी तो भक्ति आएगी। भक्ति में ही राधा प्रकट होती हैं। हर देह में राधा हैं, हर देह में श्री कृष्ण हैं; बस फर्क इतना है कि तुम्हें अपने अंदर से राधा को प्रकट करना है। तुम्हें अपने अंदर से श्री कृष्ण को प्रकट करना है क्योंकि हर भक्त ही एक दिन भगवान हो जाता है। जैसे-जैसे तुम्हारे अंदर की स्थिति उठेगी, वैसे-वैसे तुम्हें इस जीवन का आनन्द आने लगेगा।
इसलिए हर एक नाम का कुछ ना कुछ प्रतीक है; तभी हमने कृष्ण-राधा नहीं राधा-कृष्ण कहा। हम कहते हैं कि हमने स्त्री को पहले रखा, पर नहीं, स्त्री को नहीं बल्कि भक्ति को पहले रखा गया। भगवान नंबर दो पर हैं क्योंकि भक्त ही किसी को भगवान बनाता है। श्री कृष्ण कहते हैं कि ‘”राधा, तुम ना होती तो कोई मुझे भगवान कहता?” भक्त किसी को भगवान बनाता है, भगवान कहीं बाहर से नहीं आता। राधा की भक्ति ने श्री कृष्ण को भगवान बनाया इसलिए श्री कृष्ण ने कहा पहले तू, यानी राधा-कृष्ण। यह एक शुद्ध सम्बन्ध है। इस अनंत के रिश्ते को जानने के लिए तुम्हें शरीर से अंदर की ओर जाना पड़ेगा, उस द्वार के अंदर जहाँ पर गुरु तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। जब तुम्हारी अंदर यात्रा शुरू होती है, तब तुम्हारा सत् से मिलन होता है, भगवान से मिलन होता है; तभी ये जीवन उस परम जीवन से मिलता है और तुम्हारी यात्रा सफल होती है।
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