नवरात्रि: बाहरी उत्सव नहीं, आत्म-साधना का अवसर

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माँ वैष्णो को जगत जननी और पूरे जगत को जन्म देने वाली कहा गया है। वे शक्ति का स्वरूप हैं। आज नवरात्रे चल रहे हैं! नवरात्रि यानी नौ रातें। हमें मालूम ही है कि जब नवरात्रि का नाम आता है, तो माँ का नाम आता है। माँ के अनेक रूप माने गए हैं, माँ वैष्णो, माँ शैलपुत्री, माँ ब्रह्मचारिणी, माँ कात्यायनी, माँ काली आदि। माँ ने नौ दिनों में नौ रूप बदल डाले। कोई भी उत्सव जो धर्म से संबंधित है, वह जीवन से संबंधित होता है, शरीर से नहीं। शरीर तो मरणशील काया है, पर जीवन जो अंदर बह रहा है, जिसे आत्मा कहते हैं, वो तुम हो। नवरात्रि में माँ ने अलग-अलग रूप क्यों लिए? कहते हैं ना महिषासुर वो राक्षस था जिसने ब्रह्मा जी से वरदान माँग लिया था कि न मुझे कोई देवता मार सके, न कोई दानव मार सके, न कोई इंसान मार सके। वो यह भूल गया कि उसने स्त्री को इसमें शामिल नहीं किया कि स्त्री भी न मार सके। उसने वरदान ले लिया और महिषासुर ने सारे लोकों को जीतने के लिए परलोक और स्वर्ग लोक पर कब्ज़ा कर लिया। जब सब देवता हार गए, तो आखिरी में वे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे पूछने के लिए कि क्या करें? फिर ब्रह्मा, विष्णु और महेश बैठे। कहते हैं उन तीनों से शक्ति निकली और तीनों की शक्तियाँ मिलकर माँ दुर्गा प्रकट हुईं। फिर माँ दुर्गा से सबने प्रार्थना की। सब देवताओं ने अपने हथियार दिए, सुदर्शन चक्र दिया, महादेव ने त्रिशूल दिया, राजा इंद्र ने वज्र दिया और माँ से प्रार्थना की कि माँ, महिषासुर ने हमें स्वर्ग से बेघर कर दिया है और पूरा आतंक मचा दिया है। महिषासुर का क्या मतलब है? भैंसे जैसा शरीर, जिसने वरदान माँगा कि त्रिलोक में मुझे न देवता मार सकें, न दानव, न कोई पुरुष। जब सबने माँ से प्रार्थना की, तो माँ प्रकट हुईं। नौ दिन तक महिषासुर से युद्ध चला और हर दिन माँ का रूप बदलता चला गया। पहले दिन माँ शैलपुत्री का रूप दिखाया, शैल यानी हिमालय की बेटी। उन्होंने संसार को संदेश दिया कि अंदर से पहाड़ जैसे जटिल रहो, चाहे संसार में कुछ भी हो रहा हो। फिर ब्रह्मचारिणी, यानी ब्रह्म जैसा तुम्हारे अंदर आचरण आ जाए। फिर सज़ा देने के लिए माँ कात्यायनी और माँ काली आईं। जब ये सारे रूप आते चले गए, तब इन्हें नवरात्रे कहा गया। नौ रातों में माँ ने अपना रूप बदला और फिर दसवें दिन महिषासुर को मार डाला और विजय पा ली । महिषासुर यानी ‘मैं’-अहंकार। अहंकार की मृत्यु हुई। महिषासुर में कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे सब विकार थे। माँ ने किसे मारा? इसी का ज्ञान तुम्हें लेना है। बाहर की पूजा, पाठ, ज्योत और खेत्री, ये सिर्फ बाहर का धर्म हैं प्यारे! पर ये नौ रातें इसलिए कही गई हैं, क्योंकि नौ रातों के बाद नई रात भी आएगी, ताकि तुम्हारा अहंकार चकनाचूर हो जाए। इन नौ रात्रियों में तुम्हें साधना करनी है। किस बात की? कि माँ ने महिषासुर को क्यों मारा? अहंकार, कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह और न जाने कितने जो उसके नीचे थे, रक्तबीज, शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड,सबको मार डाला। ये सब क्या थे? विकारी! तो तुम्हें इन नौ दिनों में अपने विकारों को जलाना है, स्वाहा करना है। यज्ञ या हवन करोगे, तो कामवासना स्वाहा, क्रोध स्वाहा, लोभ स्वाहा, मोह स्वाहा, अहंकार स्वाहा। बाहर से नहीं, अंदर से! तो आज जागो! माता का जागरण नहीं, तुम्हारा जागरण होना चाहिए। जन्मों से तुम मर-मर कर यहाँ आ रहे हो। जिंदा माँ तुम्हारा इंतज़ार कर रही हैं। इसलिए आज इन नवरात्रों में ये मौका है। ना कि सिर्फ तुम कहो कि मैं डांडिया खेलूँगा, पार्टी करूँगा और मौज करूँगा। ध्यान रखो, माँ कोई पिकनिक के लिए नहीं हैं, माँ साधना के लिए हैं। माँ काली कोलकाता के अंदर अपना रूप दिखा रही हैं। इसलिए कहा गया है कि जागो, कहीं अंत में माँ इस रूप में न आ जाएँ। इसलिए मेरे प्यारों, आज समय है कि जगत जननी को अंदर लाओ, अंदर की ज्योत से एक हो जाओ और जीवन को जानो कि तुम ये चेतना हो। अपना जागरण करो और इस मृत्यु लोक से अमरलोक पहुँचकर अपने जन्म को सफल करो।
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