बद्री नारायण धाम की सांस्कृतिक पहचान-
यह स्थान स्वयं भगवान त्रिलोकी नाथ विष्णु जी का साधना स्थल है। इसकी लंबी कथाएं और गाथाएं हैं। और यह केवल उत्तराखंड की ही नहीं बल्कि संपूर्ण भारतीय सभ्यता संस्कार और संस्कृति का उद्गम स्थल है। लेकिन यह संस्कृति नहीं जो तुम यहां दिखा रहे हो और अनेक प्रकार से फिर इसका बचाव भी कर रहे हो। यह घोर भौतिकवादी मुंबईया सांस्कृतिक प्रदूषण है। जो बद्री नारायण सांस्कृतिक धारा के एकदम विरुद्ध है। यदि यह कार्य बद्रीनाथ धाम क्षेत्र से अलग होता तो यह प्रशंसनीय हो सकता था। लेकिन बद्रीनाथ धाम में यह अपराध जैसा प्रतीत होता है। मां अलकनंदा का ह्दय भी बैठ गया होगा। बद्रीनाथ शांति और साधना का धाम है। जहां भगवान नारायण और नर रूप में उनके परम शिष्य परम अनुयाई साधनारत हैं। संस्कृति के नाम पर जो कुछ प्रचार प्रसार के लिए वहां पर भोंडा डांस हुआ है उससे वहां की वादियों में जहर ही घुला है।

देश के प्रधानमंत्री वहां पर कुछ वर्ष पहले कुछ समय साधना में बैठे तो यह है बद्रीनाथ की वास्तविक सांस्कृतिक पहचान। इससे प्रेरणा ले सकते थे, सीख सकते थे। क्या इससे प्रचार प्रसार नहीं हुआ था? जो इस तरह के डांस कराने पड़े वहां पर! यह तो मुलायम सिंह के सैफई महोत्सव जैसा हो गया। लेकिन हर शक्ति में हर सत्ता में कहीं ना कहीं विनाश के बीज भी दबे रहते हैं। विपक्ष से पूर्व की भांति इस बार भी इस सत्ता को चुनौती देने वाला कोई नहीं था। थोड़ा बहुत जो बुजुर्ग हरीश रावत थे उनको उन्हीं की पार्टी ने किनारे लगा दिया अब इनके लिए ओपन गेम था। बीजेपी के बारे में आम धारणा भी थी कि वह हिंदुत्व की रक्षक और धार्मिकता के पुनर्जागरण की संवाहिका है। लेकिन यह कार्य ठीक उसके उलट है।
अब सांस्कृतिक प्रदूषण के बीज वो दिए गये हैं। बद्रीनाथ की धरती जींवत है। नाचने गाने वालों ने जरूर मौज ली होगी। निश्चित उनको अच्छा भी लगा होगा तमाम प्रतिभागी भी खुश होंगे। हम उनकी प्रतिभा का भी सम्मान करते हैं लेकिन स्थान का चयन एकदम गलत कर दिया गया। आश्चर्य की इस पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिलाया एक छोटा प्रतिभागी कलाकार भी कह सकता था। फिर शायद किसी की चेतना जगाती। अब देश भर में जो बद्री नारायण के प्रति चार धामों में प्रथम धाम के प्रति जो आस्थावान लोग हैं उनकी आस्था चकनाचूर हुई है।
लेकिन अभी भी एक विकल्प खुला है और वह है क्षमा याचना का एवं भविष्य में पुनरावृत्ति ना करने का, जनमानस से नहीं भगवान बद्रीनारायण से।
डाक्टर हरिनारायण जोशी अंजान
