भ्रष्टाचार की असली ताकत, हमारी चुप्पी!
लेखक : सी एम जैन
किसी सरकारी कार्यालय के बाहर खड़े उस वृद्ध व्यक्ति की कल्पना कीजिए, जो अपने जीवन की बची हुई पूंजी और उम्मीद लेकर किसी प्रमाणपत्र, पेंशन, मुआवजे या अधिकार के लिए महीनों से चक्कर काट रहा है। हर बार उसे एक नई कमी बता दी जाती है। हर बार कोई नई फाइल, नया दस्तावेज़, नई प्रक्रिया सामने आ जाती है। अंततः कोई धीरे से उसके कान में कहता है—”काम हो जाएगा, लेकिन थोड़ा खर्चा करना पड़ेगा।”
अक्सर यहीं से भ्रष्टाचार की कहानी शुरू होती हुई दिखाई देती है। हम उस व्यक्ति को देखते हैं जो पैसे मांग रहा है। हम उस हाथ को देखते हैं जो रिश्वत ले रहा है। हम उस व्यवस्था को दोष देते हैं जिसमें ईमानदारी की जगह लेन-देन ने ले ली है। लेकिन यदि हम थोड़ा और गहराई से देखें, तो एक असहज प्रश्न सामने आता है—क्या भ्रष्टाचार केवल उस व्यक्ति की वजह से जीवित है जो रिश्वत मांग रहा है, या उसकी वजह से भी जो सब कुछ देखकर चुप है?
यह प्रश्न असुविधाजनक है, क्योंकि इसका उत्तर केवल व्यवस्था की ओर नहीं, हमारी ओर भी उंगली उठाता है।
हम भ्रष्टाचार को अक्सर नैतिक समस्या के रूप में देखते हैं। हमें लगता है कि कुछ बुरे लोग हैं जो व्यवस्था को खराब कर रहे हैं। यह आंशिक सत्य है, लेकिन पूरा सत्य नहीं। यदि केवल भ्रष्ट व्यक्ति ही समस्या होता, तो किसी भी समाज में भ्रष्टाचार लंबे समय तक टिक नहीं सकता था। कोई भी अनियमितता तब तक स्थायी नहीं बन सकती जब तक उसे देखने वाले लोग उसे सामान्य मानना शुरू न कर दें।
यहीं भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक रूप दिखाई देता है। वह रिश्वत में नहीं, बल्कि सामान्यीकरण में छिपा होता है।
जब समाज यह मान लेता है कि “ऐसा तो चलता है”, तब भ्रष्टाचार कानून से नहीं, संस्कृति से शक्ति प्राप्त करने लगता है। जब लोग यह सोचने लगते हैं कि “सिस्टम ऐसा ही है”, तब अनियमितता अपवाद नहीं रहती, वह व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। और जब नागरिक यह मान लेता है कि उसके प्रश्न का कोई महत्व नहीं, तब भ्रष्टाचार को सबसे मजबूत सुरक्षा कवच मिल जाता है।
ध्यान से देखिए, भ्रष्टाचार का मनोविज्ञान केवल लालच का मनोविज्ञान नहीं है। यह निराशा का भी मनोविज्ञान है।
जो व्यक्ति रिश्वत लेता है, वह शायद अपने स्वार्थ से प्रेरित हो। लेकिन जो व्यक्ति सब कुछ देखकर भी चुप रहता है, वह अक्सर भय, असहायता, उदासीनता या सामाजिक आदत से प्रेरित होता है। उसे लगता है कि शिकायत करने से कुछ नहीं होगा। उसे लगता है कि व्यवस्था बहुत बड़ी है और वह बहुत छोटा। उसे लगता है कि विरोध करने पर उसे ही परेशानी होगी। धीरे-धीरे यह भावना व्यक्तिगत अनुभव से सामूहिक मानसिकता में बदल जाती है।
और यहीं भ्रष्टाचार सबसे बड़ी जीत हासिल करता है।
क्योंकि भ्रष्टाचार की सबसे सुरक्षित जगह कोई तिजोरी नहीं होती, बल्कि वह नागरिक मन होता है जिसने उम्मीद छोड़ दी हो।
किसी भी लोकतंत्र में भ्रष्टाचार की वास्तविक शक्ति उसके पैसों में नहीं होती। उसकी वास्तविक शक्ति उस विश्वास में होती है कि कोई उसे चुनौती नहीं देगा। जिस दिन यह विश्वास टूटने लगता है, उसी दिन उसकी नींव हिलने लगती है।
यही कारण है कि इतिहास के बड़े खुलासे अक्सर किसी बड़े आंदोलन से नहीं, बल्कि किसी छोटे प्रश्न से शुरू हुए। किसी ने खर्च का हिसाब पूछा। किसी ने निविदा प्रक्रिया पर सवाल उठाया। किसी ने भुगतान का रिकॉर्ड मांगा। किसी ने यह जानना चाहा कि सार्वजनिक धन कहाँ और कैसे खर्च हुआ। शुरुआत में वह प्रश्न मामूली लगता था, लेकिन वही प्रश्न धीरे-धीरे उस संरचना तक पहुँच गया जिसे वर्षों तक अटूट माना जाता था।
यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है। भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं है; यह लोकतांत्रिक विश्वास का क्षरण भी है।
जब किसी सड़क का निर्माण कागज पर पूरा दिखाया जाता है लेकिन जमीन पर अधूरा रहता है, तब केवल धन की हानि नहीं होती। नागरिक का विश्वास भी टूटता है। जब किसी पात्र व्यक्ति को उसका अधिकार नहीं मिलता क्योंकि किसी और ने व्यवस्था को प्रभावित कर लिया, तब केवल अन्याय नहीं होता; समान अवसर का सिद्धांत भी कमजोर पड़ता है। जब सार्वजनिक संसाधन निजी लाभ में बदल जाते हैं, तब नुकसान केवल सरकारी खजाने का नहीं होता; समाज के भविष्य का भी होता है।
इसलिए भ्रष्टाचार का प्रभाव हमेशा उन लोगों तक सीमित नहीं रहता जो सीधे उससे जुड़े होते हैं। उसका बोझ उन बच्चों तक पहुँचता है जिन्हें बेहतर स्कूल नहीं मिलते। उन मरीजों तक पहुँचता है जिन्हें गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं मिलतीं। उन किसानों तक पहुँचता है जिन्हें समय पर सहायता नहीं मिलती। उन युवाओं तक पहुँचता है जिन्हें अवसरों की जगह सिफारिशों का सामना करना पड़ता है।
यानी भ्रष्टाचार केवल धन नहीं चुराता। वह अवसर चुराता है। वह विश्वास चुराता है। वह भविष्य चुराता है। लेकिन फिर भी सबसे चिंताजनक बात यह नहीं है कि भ्रष्टाचार मौजूद है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि हम उसके साथ जीना सीख चुके हैं।
हम सड़क टूटने पर नाराज़ होते हैं, लेकिन यह नहीं पूछते कि निर्माण किसने किया था और भुगतान किस आधार पर हुआ। हम किसी सार्वजनिक परियोजना की विफलता पर चर्चा करते हैं, लेकिन उसके दस्तावेज़ देखने की कोशिश नहीं करते। हम व्यवस्था को दोष देते हैं, लेकिन व्यवस्था से जवाब मांगने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग नहीं लेते। धीरे-धीरे नागरिक की भूमिका दर्शक की भूमिका में बदल जाती है। वह देखता है। वह शिकायत करता है। वह निराश होता है। फिर वह आगे बढ़ जाता है। और भ्रष्टाचार यथावत बना रहता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं है कि नागरिक हर पाँच वर्ष में वोट डालता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि नागरिक हर दिन प्रश्न पूछ सकता है। वह जानकारी मांग सकता है। वह रिकॉर्ड देख सकता है। वह सार्वजनिक निर्णयों की समीक्षा कर सकता है। वह यह जान सकता है कि उसके नाम पर खर्च होने वाला धन वास्तव में कहाँ जा रहा है।
यही कारण है कि सूचना का अधिकार, सामाजिक लेखा परीक्षा, सार्वजनिक सुनवाई, शिकायत तंत्र और पारदर्शिता से जुड़ी व्यवस्थाएँ केवल कानूनी प्रक्रियाएँ नहीं हैं। वे लोकतंत्र की आत्मरक्षा के साधन हैं। लेकिन कोई भी साधन तभी प्रभावी होता है जब उसका उपयोग किया जाए। एक तलवार दीवार पर टंगी रहे तो केवल सजावट होती है। उसी प्रकार अधिकार यदि उपयोग में न आएँ तो वे केवल कागज़ पर लिखे शब्द बनकर रह जाते हैं।
यह भी सच है कि हर नागरिक से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह हर अनियमितता के खिलाफ अकेले लड़ाई लड़े। लेकिन लोकतंत्र की शक्ति भी किसी एक नायक पर निर्भर नहीं होती। वह लाखों छोटे-छोटे नागरिक कर्मों से बनती है। एक शिकायत, एक प्रश्न, एक सूचना आवेदन, एक सार्वजनिक चर्चा, एक तथ्य आधारित आपत्ति—ये सब मिलकर उस संस्कृति का निर्माण करते हैं जिसमें भ्रष्टाचार सहज महसूस नहीं करता।
समाज तब बदलता है जब लोग यह मानना बंद कर देते हैं कि कुछ नहीं बदल सकता। और शायद भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ी क्रांति भी यहीं से शुरू होती है। उस दिन से नहीं जब कोई बड़ा घोटाला उजागर होता है। उस दिन से नहीं जब कोई बड़ी गिरफ्तारी होती है।
बल्कि उस दिन से जब एक साधारण नागरिक यह निर्णय लेता है कि वह केवल शिकायत नहीं करेगा, बल्कि समझेगा; केवल गुस्सा नहीं करेगा, बल्कि प्रश्न पूछेगा; केवल चर्चा नहीं करेगा, बल्कि जवाबदेही की प्रक्रिया में भाग लेगा।
क्योंकि भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा शत्रु कोई एक कानून नहीं है। कोई एक एजेंसी नहीं है। कोई एक नेता नहीं है। उसका सबसे बड़ा शत्रु वह जागरूक नागरिक है जिसने अपनी चुप्पी तोड़ दी हो। और शायद भारत के लोकतांत्रिक भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न भी यही है—क्या हम भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए केवल ईमानदार लोगों की तलाश करेंगे, या ऐसे नागरिक भी तैयार करेंगे जो गलत को देखकर चुप न रहें? क्योंकि भ्रष्टाचार रिश्वत से जन्म ले सकता है। लेकिन वह जीवित चुप्पी से रहता है। और जिस दिन समाज की चुप्पी टूट जाएगी, उसी दिन भ्रष्टाचार की सबसे मजबूत दीवार में पहली दरार नहीं, बल्कि सबसे गहरी दरार पड़ चुकी होगी।
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