आत्महत्या: स्वयं के भीतर बैठे भगवान की हत्या

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आत्महत्या! आत्महत्या शब्द आजकल बहुत चर्चा में है।आत्महत्याएँ तो होती ही आ रही थीं, ऐसा नहीं है कि नहीं हो रहीं थीं; आज दुनिया में हर दूसरे सेकंड में एक जना आत्महत्या करने की कोशिश करता है। अज्ञान के कारण आत्महत्याएँ हो रही हैं। यदि अंदर ज्ञान का प्रकाश आ जाए कि मृत्यु कभी किसी की होती ही नहीं है, न जन्म होता है और न मौत होती है तो ये आत्महत्याएँ रुक सकती हैं। ऊर्जा का शरीर के अंदर आना जन्म है और ऊर्जा का शरीर से बाहर निकलना मौत है। इस शरीर में तुम यात्रा करने के लिए आए हो। हमें इस ज़िंदगी के खेल को समझना है कि शरीर रूपी यंत्र में हम क्यों आये हैं? क्या मैं माँ हूँ, बाप हूँ, बेटा हूँ, बेटी हूँ, भाई हूँ, बहन हूँ, पति हूँ या मैं पत्नी हूँ? जब हमें मालूम ही नहीं कि हम कौन हैं, तो दुख आएगा, अशांति आएगी। जब दुख बहुत ज़्यादा हो जाता है तो इंसान सोचता है कि चलो मर ही जाते हैंI पर हम मार किसको रहे हैं? जिसने हमें माँ के गर्भ में शरीर को नौ महीने तक बनाया उसकी बहुत मेहनत लगी है बनाने में। और इसको जो चला रहा है, वो बहुत कीमती है। हम क्या बनायेंगे? सिर के बाल से लेकर पैर के नाखून तक के लिए तो हम भिखारी हैं, हमें सब कुछ मुफ्त में मिला है। हम जिंदगी को ही नहीं समझे , इस शरीर की कीमत को ही नहीं समझे, जिसका कोई मोल ही नहीं है; और उसको अगर हम मारने की सोचें तो आगे बाप यमराज बैठा है। वो कहेगा कि अमूल्य शरीर को तुमने मारा कैसे? क्या ये तुम्हारा था? क्या तुमने इसे कहीं से खरीदा था? तुम्हें सब मुफ्त में मिला है। ये शरीर हमारा नहीं है। ये जिसने दिया है उसको जानो! उसे चाहे श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद, कबीर, फरीद, गुरु नानकदेव, रामकृष्ण परमहंस, साईंबाबा, मीराबाई, सहजोबाई, लल्लाबाई, लाओत्से या सुकरात कहो! ये जितने मैंने नाम लिए, ये कौन थे? ये हमारे जैसे ही लोग थे। उन्होंने जिंदगी में यही जाना कि यह शरीर मेरा नहीं है और उन्होंने इसे परमात्मा को लौटा दिया। उन्होंने एहसास किया, तो कहा कि “गलती हो गई कि मैंने इसे अपना मान लिया, मुझे माफ कर।” आत्महत्या जैसा शब्द महा बद्कर्म है, इस धरती पर ही नहीं, ब्रह्माण्ड में भी, ये याद रखना। हमने जिंदगी में कोई भी गलत कर्म किया हो, सबकी सजा आत्महत्या के मुकाबले बहुत कम है।आत्महत्या करना इस ब्रह्माण्ड में सबसे बड़ा अपराध है। अगर इस शरीर को मारा, तो आगे के सारे जन्म अपाहिज होंगे। हम देखते है ना कि कई अपाहिज पंछी और जानवर घूम रहे होते हैं, वे सारे ही अपाहिज जन्म होते हैं। संसार दुख ही है। अगर हम इस जिंदगी को सिर्फ एक रोल मान लें, तो जिन्दगी फर्स्ट क्लास हो जाएगी। जीसस ने कहा था ‘टोटल एक्सेप्टेबिलिटी’और महावीर ने कहा था कि ‘अहिंसा परमोधर्म:’ यानी कि अपने पर हिंसा मत करो, अपने को दुखी मत करो। इसलिए जागो और जगाओ! हमें जो ज्ञान मिला है और अगर हम मौज में आए हैं, तो इसे दूसरों में बाँटना हमारा धर्म है। पूरा संसार एक परिवार है, हम एक से ही उपजे हैं और एक में ही समाना है। कितने जन्म हो गए हमारे, हजारों- लाखों भाई- बहन, माँ- बाप और परिवार के लोग संसार में घूम रहे हैं और हमे पता तक नहीं है। जब हम जाग जायेंगे कि यह पूरा संसार ही मेरा परिवार है, तब तुम अपने आप ही यह सेवा करोगे। मैंने जैसे ये टैगलाइन दी है कि “तुझे मैं दुखी नहीं होने दूँगा”। तो क्या मैं तुम्हें आत्महत्या करने दूँगा?
खुशहाली की गारंटी है। इसलिए इस संदेश को आगे पहुँचाओ ताकि आत्महत्याएँ थोड़ी कम हों। लोग अपने को मार रहें हैं। जो मर रहें हैं वो तो मर ही रहें हैं और वो अपनी आत्महत्या के कारण आगे सजाएँ भोगेंगे। मैंने कहा ना कि अपने को मारना मतलब ‘ब्रह्म-हत्या है, जैसे कि तुमने भगवान का गला घोंट दिया हो। अपने को मारना यानी भगवान का ही गला घोंटना है। इसलिए ऐसा महा अपराध कभी मत करना। ये सब अज्ञान वश होता है; ज्ञान होने के बाद कभी कोई ऐसा नहीं करेगा। इसलिए सहज हो जाओ, जागो, जगाओ और अपने जन्म को सफल करो।

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