संयुक्त नागरिक संगठन ने भूस्खलन अर्ली वार्निंग सिस्टम,डॉप्लर राडार आदि चेतावनी सूचक उपकरणों को तत्काल लगाने की मांग की
देहरादून: केदारनाथ,हर्सिल/धाराली,नेपाल में हुई विनाशकारी आपदाओं के जनक ग्लेशियरों में उगते वाटर बम (GLOF) से लिए जाए सबक। उत्तराखंड के भूकंप जोन 4-5 में स्थित पहाड़ी क्षेत्रों में प्रस्तावित भूकंप चेतावनी प्रणाली ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन,भूस्खलन अर्ली वार्निंग सिस्टम,डॉप्लर राडार आदि चेतावनी सूचक उपकरणों को तत्काल लगाने की मांग की है.
संयुक्त नागरिक संगठन द्वारा मुख्यसचिव,आपदा प्रबंधन सचिव, मुख्यमंत्री को लिखे गए पत्रों में ये मांग करते हुए बताया गया है की जनपद पिथौरागढ़,भारत-नेपाल सीमा पर विगत समय में ग्लेशियरों में नई झीलें चिन्हित हुई हैं जो कमजोर चट्टानों व मलबे के मोराइन बाँध से बनी हैं जिन्होंने ‘वॉटर बम’ GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का रूप ले लिया है। तेज बारिश, भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियर का हिस्सा गिरने पर इनके फूटने की संभावना है जो विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकती है। संगठन उपाध्यक्ष गिरीश चंद्र भट्ट ने लिखा है की NDMA द्वारा इन क्षेत्रों में 13 झीलें अत्यंत संवेदनशील मानी गई हैं इसलिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए।भेजे गए सुझावों मे लिखा गया है की भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील दून सहित पहाड़ी क्षेत्र जोन 4 और 5 की खतरनाक श्रेणी में है। यहां प्रस्तावित 500 भूकंप चेतावनी प्रणाली (EEWS) में से अब तक आधे ही लगे हैं।नेपाल-हिमाचल सीमा के थ्रस्ट एरिया में सभी जगह इस योजना को तत्काल पूरा किया जाना चाहिए। मौसम चेतावनी के लिए ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन (AWS) समेत दून, अल्मोड़ा, चंपावत, चमोली में प्रस्तावित डॉप्लर रडार लगाने समेत मल्टी-हैजर्ड सायरन सिस्टम, जीएसआई से सम्बद्ध भूस्खलन अर्ली वार्निंग लगाने के कार्य भी युद्धस्तर पर किए जाएँ।सभी झीलों का इसरो/WIHG के सहयोग से सैटेलाइट मैपिंग कर जोखिम श्रेणीकरण किया जाए।
