*शब्दवीणा की मासिक साहित्यिक भेंटवार्ता ‘एक शाम साहित्य के नाम’ के जून अंक में कवि प्रो. डॉ. विमल प्रकाश गौतम ने साहित्य के उद्देश्यों पर रखे विचार*

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*-रिश्तों में मुझको न छल चाहिए, हृदय हमारा निर्मल चाहिए*

*-साहित्यकार की कलम में ईमानदारी एवं सच्चाई होनी चाहिए*

*-साहित्यकारों को जनमानस की समस्याओं पर लेखनी चलाने की है जरूरत*

गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ की हरियाणा प्रदेश समिति एवंं फरीदाबाद जिला समिति के संयुक्त संयोजन में आयोजित मासिक साहित्यिक भेंटवार्ता “एक शाम साहित्य के नाम’ के जून 2026 अंक में बतौर आमंत्रित साहित्यकार कवि प्रो. डॉ. विमल प्रकाश गौतम उर्फ डॉ विमल फरीदाबादी रहे। कार्यक्रम की संयोजिका एवं संचालिका शब्दवीणा हरियाणा प्रदेश सचिव एवं फरीदाबाद जिला समिति की संरक्षक सरोज कुमार ने डॉ विमल का संक्षिप्त शैक्षणिक एवं साहित्यिक परिचय देते हुए शब्दवीणा के राष्ट्रीय मंच पर अभिनंदन किया। कार्यक्रम की समन्वयक एवं शब्दवीणा की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी ने भी डॉ विमल प्रकाश का स्वागत किया। सरस्वती वंदना की प्रस्तुति के उपरांत सरोज कुमार ने डॉ विमल से एक शिक्षक एवं साहित्यकार के सामाजिक दायित्वों एवं साहित्य के उद्देश्यों पर बातचीत प्रारंभ की।

डॉ विमल ने बतलाया कि वर्तमान में वे पंडित जवाहरलाल नेहरू राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फरीदाबाद, हरियाणा में शारीरिक शिक्षा विषय के सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं तथा वे केन्द्रीय विद्यालय संगठन एवं नवोदय विद्यालय समिति में भी फिजिकल एजुकेशन टीचर के रूप में भी अपनी सेवा दे चुके हैं। एक खेल शिक्षक एवं साहित्यकार के रूप में वे अपने छात्र-छात्राओं में अनुशासन, सक्रियता, देश और समाज में फैली बुराइयों के प्रति सुधारात्मक दृष्टिकोण, मानवीयता, संकल्पबद्धता, सामूहिक एकता और अपनत्व जैसे गुणों का संवर्द्धन करने की कोशिश करते रहे हैं। उन्होंने अच्छे शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए खिलाड़ियों को भी साहित्य से जुड़े रहने का परामर्श दिया। वार्ताकार श्रीमती सरोज कुमार द्वारा पूछे जा रहे प्रश्नों का उत्तर देते हुए डॉ विमल ने कहा कि मानवीय रिश्तों में ईमानदारी का होना बहुत जरूरी है। सबसे पहले हमें स्वयं के प्रति ईमानदार रहने की जरूरत है, तभी हम देश तथा समाज के प्रति ईमानदार रह सकते हैं। उन्होंने अपने एकल काव्य संग्रह ‘कविता-ए-तल्ख’ में से “रिश्तों में मुझको न छल चाहिए, हृदय हमारा निर्मल चाहिए” गीत सुमधुर स्वर में गाकर सुनाया।

डॉ विमल ने बताया कि लेखक एवं सह-लेखक के रूप में अब तक उनकी सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने “नारी से जनम, नारी का दमन” कविता द्वारा समाज में जन्म देने वाली नारियों के दलन, दमन, और शोषण पर चिंता जताई। समाज में बुराइयों पर अच्छाइयों के विजय के लिए साहित्यकार की भूमिका को महत्वपूर्ण बतलाते हुए कहा कि साहित्यकार की कलम में ईमानदारी और सच्चाई होनी चाहिए। एक साहित्यकार को जनमानस की समस्याओं पर लेखनी चलानी चाहिए। डॉ विमल ने पीड़ा के विविध स्वरूपों पर विचार रखे। उन्होंने शब्दवीणा द्वारा “एक शाम साहित्य के नाम” में आमंत्रण को देश भर के साहित्यप्रेमी श्रोताओं से जुड़ने का अविस्मरणीय अवसर बतलाते हुए डॉ. रश्मि, श्रीमती सरोज एवं शब्दवीणा परिवार के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। शब्दवीणा के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

कार्यक्रम का सीधा प्रसारण फेसबुक पर शब्दवीणा केन्द्रीय पेज से किया गया, जिससे जुड़कर जैनेन्द्र कुमार मालवीय, महेश चंद्र शर्मा राज, सुरेश विद्यार्थी, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, प्यारचन्द कुमार मोहन, सुरेश विद्यार्थी, पुरुषोत्तम तिवारी, डॉ विजय शंकर, डॉ परशुराम तिवारी भार्गव, नंद किशोर जोशी, डॉ वीरेन्द्र कुमार, डॉ रवि प्रकाश, डॉ वीरेन्द्र कुमार, डॉ रश्मि प्रियदर्शनी सहित देश के विभिन्न प्रदेशों के साहित्य प्रेमियों ने भेंटवार्ता का लाभ उठाया।

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