उत्तराखंड की पहल : शिक्षा में समानता की नई परिभाषा

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वरिष्ठ पत्रकार शिवेश्वर दत्त पाण्डेय

उत्तराखंड सरकार द्वारा अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू कर राज्य में मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय न केवल प्रशासनिक परिवर्तन है, बल्कि यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था में समानता और समरसता की दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है। इस निर्णय के बाद राज्य में सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान अब उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद के अधीन आएंगे। इससे राज्य देश का पहला ऐसा प्रदेश बन गया है जिसने शिक्षा के क्षेत्र में अलग-अलग बोर्डों की व्यवस्था को समाप्त कर एकसमान शैक्षिक प्रणाली की ओर कदम बढ़ाया है।

शिक्षा किसी भी समाज का सबसे मजबूत आधार होती है। जब उसमें वर्ग या समुदाय के आधार पर भेदभाव होता है, तो समान अवसर की भावना कमजोर पड़ती है। मदरसों की शिक्षा व्यवस्था अब तक धार्मिक अध्ययन तक सीमित रही है, जिससे वहाँ के छात्र अक्सर मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धाओं से कट जाते थे। नई व्यवस्था से वे अब वही पाठ्यक्रम पढ़ सकेंगे जो अन्य विद्यालयों में पढ़ाया जाता है। इससे उन्हें उच्च शिक्षा, तकनीकी क्षेत्र और रोजगार के अवसरों में समान भागीदारी मिलेगी।

यह सुधार न केवल शैक्षणिक बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय से यह मांग उठती रही कि शिक्षा की एक ऐसी नीति बने जिसमें धर्म या समुदाय के नाम पर कोई भेदभाव न रहे। उत्तराखंड का यह कदम उसी दिशा में आगे बढ़ता प्रतीत होता है। इससे आने वाली पीढ़ी को समान अवसर, समान पाठ्यक्रम और समान प्रतिस्पर्धा का वातावरण मिलेगा।

साथ ही, यह निर्णय शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी बढ़ाएगा। मदरसा बोर्ड पर समय-समय पर अनियमितताओं, निगरानी की कमी और मानकों के अभाव के आरोप लगते रहे हैं। अब जब ये संस्थान राज्य शिक्षा बोर्ड के अधीन आएंगे, तो पाठ्यक्रम, परीक्षा प्रणाली और शिक्षण गुणवत्ता में सुधार की उम्मीद की जा सकती है। इससे सरकारी सहायता का बेहतर उपयोग होगा और शिक्षण संस्थानों में एकरूपता स्थापित होगी।

फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि मदरसों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। वहाँ केवल शिक्षा नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का संवहन होता है। यदि सरकार इस सुधार को कठोर प्रशासनिक आदेश की तरह लागू करेगी, तो इससे असंतोष और अविश्वास की स्थिति पैदा हो सकती है। सुधार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी संवेदनशीलता और संवाद के साथ लागू किया जाता है। धार्मिक अध्ययन को पूर्णतः समाप्त करने के बजाय उसे वैकल्पिक या पूरक विषय के रूप में जारी रखना अधिक उचित होगा।

भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को अपने धर्म और संस्कृति के अनुरूप शिक्षण संस्थान स्थापित करने का अधिकार देता है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकार इस अधिनियम के क्रियान्वयन में संवैधानिक मर्यादा और धार्मिक स्वतंत्रता का पूरा ध्यान रखे। इस सुधार का उद्देश्य किसी की पहचान मिटाना नहीं, बल्कि उसे आधुनिक शिक्षा और समान अवसरों से जोड़ना होना चाहिए।

उत्तराखंड का यह निर्णय शिक्षा सुधार की दिशा में एक प्रयोग है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो यह देश के अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है। यह साबित करेगा कि समान शिक्षा व्यवस्था से समाज में समानता, एकता और राष्ट्रीय एकात्मता की भावना और मजबूत होती है।

शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे ऐसे सुधार तभी सार्थक हो सकते हैं, जब उनका केंद्र राजनीति नहीं, बल्कि विद्यार्थी का भविष्य हो। उत्तराखंड सरकार ने एक साहसिक शुरुआत की है—अब यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह इस परिवर्तन को सहयोग, संवाद और संवेदनशीलता के साथ आगे बढ़ाए।

समान शिक्षा, समान अवसर और समान भविष्य की यह दिशा केवल नीतिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का भी प्रतीक बन सकती है। उत्तराखंड ने जो बीज बोया है, वह यदि सही ढंग से सींचा गया तो यह आने वाले समय में एक ऐसे भारत का निर्माण करेगा जहाँ शिक्षा वास्तव में सबके लिए समान होगी — बिना भेदभाव, बिना विभाजन, केवल ज्ञान और विकास के आधार पर।

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