हिन्दू समाज के धार्मिक पूजा स्थलों एवं श्रद्धा केंद्रों की अपनी प्राचीन परंपराएं, मर्यादाएं एवं धार्मिक व्यवस्था होती है। ये पर्यटन स्थल नहीं हैं: वरिष्ठ एडवोकेट कुमार

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हरिद्वार. विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार वरिष्ठ एडवोकेट उच्चतम न्यायालय अपने उत्तराखण्ड प्रवास के दौरान हरिद्वार में प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि हिन्दू समाज के धार्मिक पूजा स्थलों एवं श्रद्धा केंद्रों की अपनी प्राचीन परंपराएं, मर्यादाएं एवं धार्मिक व्यवस्था होती है। मंदिर पर्यटन या भ्रमण के स्थल नहीं हैं, वहां भगवान की प्रतिष्ठा होती है और श्रद्धालु वहां पूजा-अर्चना के उद्देश्य से वहां आते हैं। जिनका धर्म मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता और मूर्ति को तोड़ने का आदेश देता हो अथवा जो मानते हो उन्हीं का भगवान, उन्हीं की पुस्तक से उन्हें मोक्ष मिलेगा ऐसे संदर्भों में धार्मिक संस्थाएं अपनी परंपरागत व्यवस्था लागू कर सकती हैं।

सांस्कृतिक विषयों पर विश्व हिन्दू परिषद परिषद का दृष्टिकोण रखते हुए आलोक कुमार ने कहा कि नवरात्रि के दौरान आयोजित गरबा केवल मनोरंजन का कार्यक्रम नहीं, अपितु माता अंबा की आराधना से जुड़ी धार्मिक परंपरा है। पारंपरिक रूप से इसे नंगे पैर एवं दीप/ज्योति के साथ देवी की आराधना के रूप में किया जाता है। ऐसे आयोजनों की मूल धार्मिक भावना एवं परंपरा को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। इस कार्यक्रम में अन्य धर्मों के लोगों को आने का आग्रह करना ठीक नहीं है।

उन्होंने कहा कि विश्व के विभिन्न धर्मों में भी उनके विशिष्ट धार्मिक स्थलों को लेकर विशेष परंपराएं हैं। इस्लाम धर्म में मक्का-मदीना के पवित्र स्थलों पर गैर मुस्लिम प्रवेश प्रतिबंधित है तथा विभिन्न ईसाई संप्रदायों एवं अन्य धार्मिक परंपराओं में भी धार्मिक स्थलों के संबंध में विशेष व्यवस्थाएं प्रचलित हैं। हमको यह स्वीकार हैं क्योंकि वह उनके विशिष्ट तीर्थस्थान हैं जहां वह श्रद्धा से पूजा करते हैं। विश्व हिन्दू परिषद का मानना है कि प्रत्येक धर्म अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार व्यवस्था बनाए रखने का अधिकार रखता है।

उत्तराखण्ड की जनसंख्या संरचना के विषय पर विश्व हिन्दू परिषद की चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य के कुछ क्षेत्रों में डेमोग्राफी में परिवर्तन देखने को मिल रहा है। विश्व हिन्दू परिषद ने मांग करती हैं कि यह अध्ययन किया जाए कि हरिद्वार एवं आसपास के क्षेत्रों में किसी विशेष समुदाय की बसावट किसी संगठित योजना के अंतर्गत तो नहीं बढ़ रही है।
अंत में उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद का मानना हैं कि धार्मिक आस्था, सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए समाज एवं शासन को मिलकर संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत कार्य करना चाहिए।

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