मन ही मनुष्य की ‘मुक्ति’ और ‘बन्धन’ दोनों का कारण : भारती
देहरादून। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, देहरादून के आश्रम सभागार में आज एक बार फिर से दिव्य गुरू ‘आशुतोष महाराज’ की कृपा-वर्षा भक्तजनों पर हुई। अवसर था, प्रत्येक रविवार को आयोजित किए जाने वाले सत्संग-प्रवचनों तथा मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का। सदैव की भांति आज भी कार्यक्रम का शुभारम्भ मंचासीन ब्रह्मज्ञानी संगीज्ञों द्वारा प्रस्तुत अनेक सुन्दरतम भजनों की प्रस्तुति के साथ किया गया।
भजनों की सटीक व्याख्या करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी अनीता भारती के द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि जिस प्रकार एक मछली को अगर जल से बाहर निकाल दिया जाए तो वह बेचैन होकर तड़पने लगती है, उसी प्रकार से कामनाओं-वासनाओं में फंसा हुआ मनुष्य भी इनसे विलग होकर तड़पने लगता है, बेचैन हो जाता है। संतों-महापुरूषों का दिव्य कथन है कि जब तक इंसान विषयों के ‘विष’ को अपने भीतर रखा करता है तब तक वह ईश्वर की राह पर आगे बढ़ने में स्वयं को असमर्थ ही पाता है। इस विष को समाप्त करने के लिए ‘पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ सदगुरू’ ही एकमात्र ‘उपचारक’ हैं, वे अपने परम पावन ‘ब्रह्मज्ञान’ की दिव्य ‘औषधि’ को प्रदान कर विषयी मनुष्य का विषय ही परिवर्तित कर दिया करते हैं, उसे परमात्मा रूपी दिव्य विषय का अभिलाषी बनाकर उसका परम कल्याण किया करते हैं। साध्वी जी ने कहा कि मन ही मानव के उत्थान तथा पतन दोनों का कारण बनता है। दिशा ही इसका निर्धारण किया करती है। गुरू चरणों में ‘नमन’ हो जाने पर मन सकारात्मक दिशा में अग्रसर होने लगता है।
कार्यक्रम में ‘सदगुरू आशुतोष महाराज’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी ने प्रवचन करते हुए बताया कि मनुष्य का मन चार प्रकार से प्रभावित हुआ करता है। समय, स्थान, संगत तथा अन्न इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समय की कद्र जो करता है तब समय भी उसकी कद्र करने लगता है। जो समय इंसान सत्पुरूषों की संगति में व्यतीत करता है तब यह समय उसके मन के भीतर सकारात्मक सुन्दर विचारों की सृजना करते हुए उसे कल्याण पथ पर आगे बढ़ाता है। स्थान का प्रभाव, अर्थात जहां पर नकारात्मक गतिविधियों का संचालन होता हो, जैसे कि शराब, मांसाहार अथवा अन्य कोई भी नकारात्मक प्रवृत्तियों को बढ़ाने वाला स्थान, यह इंसान के मन पर कुप्रभाव छोड़ता है और इंसानी मन इनसे दूषित हो जाता है। तीसरा प्रभाव है संगत का! यह मानव मन की दिशा और दशा दोनों को तय किया करती है संग का रंग तो मन पर गहरा असर छोड़ता ही है। इसीलिए महापुरूषों ने सत्संग को मानव के लिए अति आवश्यक बताया है। सत्संग में आकर मन पवित्र होकर परमात्मा की दिशा में बढ़ने लगता है। तीसरा और सबसे शक्तिशाली प्रभाव है अन्न का प्रभाव। महापुरूष कहते हैं- ‘‘जैसा खाओ अन्न, वैसा बने मन।’’ इंसान यदि सात्विक तथा पवित्र भोजन करता है तो उसका मन भी पवित्र और सात्विक विचारों को ही अपने भीतर पैदा करता है, जबकि दूषित और अभक्ष्य अन्न से मन के भीतर ‘विकृति’ ही जन्म लेती है जिससे मन मनुष्य को पतन की ओर धकेलता है। मन दरवाजे की चाबी की तरह है, खोलने तथा बंद करने के लिए एक ही चाबी हुआ करती है, फर्क सिर्फ अलग-अलग दिशा की ओर घुमाने का ही हुआ करता है।
