उत्तराखण्ड में जंगलों की धारण क्षमता से अधिक है गुलदार

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मानव-वन्य जीव संघर्ष का मानव जीवन पर प्रभाव

लेनटाना झाड़ी का अत्यधिक फैलाव है मानव वन्य जीव संघर्ष का मुख्य कारण

हरिद्वार. वन्य जीवन विशेषज्ञ व गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं कुल सचिव के अनुसार उत्तराखंड में वर्तमान में 2275 से अधिक गुलदार रह रहे हैं, यह संख्या उत्तराखंड के जंगलों की धारण क्षमता से कई गुना अधिक है. एक गुलदार का होम रेंज यानी शिकार करने की टेरिटरी लगभग 30 से 50 वर्ग किमी है. और उत्तराखंड का वर्तमान में फॉरेस्ट कवर 24686 वर्ग किमी हैl इस हिसाब से उत्तराखंड के जंगलों में लगभग 500 गुलदार ही ठीक से रह सकते हैं, शेष 1700 गुलदार जंगली क्षेत्र से बाहर ग्रामीण व शहरी अंचलों , स्क्रब फॉरेस्ट और एग्रीकल्चर फील्ड में भ्रमण करते रहते है जिस कारण मानव वन्य जीव संघर्ष की घटनाएं आए दिन होती रहती हैं.

प्रोफेसर दिनेश चंद्र भट्ट की टीम को टिहरी जिले में विस्तृत सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि इस जिले में विगत 10 वर्षों में प्रतिवर्ष तीन व्यक्ति गुलदार द्वारा मारे गए और 7 व्यक्ति घायल हुए, इसी तरह प्रतिवर्ष भालू द्वारा औसतन एक व्यक्ति मारा गया और सात व्यक्ति घायल हुए.
सन 21 और 22 यानी 2 वर्षों का आकड़ा बताता है की 172 पालतू पशु गुलदार द्वारा मारे गए,

जहां तक पौड़ी गढ़वाल जिले की बात है वहां सन 2025 में ही 15 से अधिक व्यक्ति गुलदार द्वारा मारे गए और विगत पांच वर्षों में गुलदार ने 27 लोगों की जान ले ली .

डॉ दिनेश भट्ट की टीम को शोध सर्वे में 65% लोगों ने विदेशी वनस्पति लेनटाना झाड़ी के अत्यधिक फैलाव को वन्य जीव संघर्ष का मुख्य कारण बताया. शेष लोगों ने विकास कार्य एवं जंगल की आग को मानव वन्य जीव संघर्ष का संभावित कारण बताया.

डॉ. दिनेश भट्ट ने बताया की पौड़ी गढ़वाल के लगभग हर दूसरे तीसरे गांव में एक दर्जन से अधिक जंगली सूअर ,लगभग दो दर्जन बंदर और इतनी ही ही संख्या में मोर खेतों को नुकसान पहुंचा रहे हैंl और इनसे निपटने का कोई उपाय सरकार की तरफ से नहीं बताया गया है.
आंकड़े बताते हैं की उत्तराखंड के 3940 गांव में एक भी इंसान नहीं रहता.
पलायन, गैस की उपलब्धता और पशुपालन में ( गुलदार के आक्रमण के फल स्वरुप) अत्यधिक कमी के कारण ग्रामीणों की जंगलों पर निर्भरता काफी कम हो गई हैl जिससे बंजर खेत भी अब जंगल में परिवर्तित हो रहे हैं और सर्वत्र जंगल एवं बंजर जमीन पर विदेशी लांटना झाड़ी खूब फल फूल रही है जो गुलदार व अन्य जंगली जानवरों को छिपने के लिए मुफीद जगह प्रदान कर रही है.

डॉ दिनेश भट्ट ने बताया की यह कहना गलत है की गढ़वाल मे सघन वनों की कमी और जंगल मे गुलदार को भोजन की कमी है. भारतीय सर्वेक्षण विभाग के आंकड़े बताते है की गढ़वाल मे विगत 10 वर्षो मे सघन वनों का शेत्रफल बढ़ गया है और जंगल मे बन्दर, लंगूर , काकड़ , मोर व अन्य जीवो की संख्या कई गुना बढ़ गई है.

पौड़ी गढ़वाल के ग्राम भटगांव के मूल निवासी डॉ. दिनेश भट्ट की इस शोध टीम में जयहरिखाल पीजी कॉलेज से डॉ. मोहन कुकरेती, उत्तराखंड संस्कृत वि.वि.से डॉ. विनय सेठी ,पतंजलि वि वि. से डॉ. रोमेश, डोईवाला पीजी कॉलेज से डॉ.त्रिभुवन ग्राफिक एरा यूनि. से डॉ. आशीष, रुड़की से डॉ विकास सैनी इत्यादि शामिल थे. यह शोध पत्र रूस की वैज्ञानिक पत्रिका बायोलॉजी बुलेटिन में प्रकाशित हुआ है.

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