*विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘शब्दवीणा’ का भव्य कवि सम्मेलन सम्पन्न*
*-बादल-बादल बरसा पानी, सबका मन हर्षाए। कोई परिंदा इस धरती पर प्यासा ना रह जाए*
*-दिवंगत डॉ. बशीर बद्र एवं राजकमल सारथी को दी गई मौन श्रद्धांजलि*
*-आँगन के पंछी ना जाने कब के छोड़ चुके हैं आँगन*
*-दोपहरी में पीपल की छाँव, नीम तले झिलमिल ठाँव*
हुगली/कोलकाता। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ के तत्वावधान में विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष्य में “पर्यावरण और हम” विषय पर एक भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन हुगली जिले के नूतनपारा, खुड़ीगाछी स्थित श्री गणेश भवन में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना तथा साहित्य के माध्यम से प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश प्रसारित करना था। कार्यक्रम का संयोजन एवं समन्वयन शब्दवीणा की पश्चिम बंगाल प्रदेश समिति के अध्यक्ष रामनाथ बेख़बर, सचिव राम पुकार सिंह, संगठन मंत्री डॉ. शिव प्रकाश दास तथा प्रचार मंत्री संजीव कुमार दुबे ने संयुक्त रूप से किया। संस्था की राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी ने इस आयोजन को साहित्य और सामाजिक सरोकारों के समन्वय का एक सार्थक एवं प्रेरणादायी प्रयास बताया। कार्यक्रम का शुभारंभ अर्चित यादव द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ। वरिष्ठ साहित्यकार शंकर रावत ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि रणजीत भारती मुख्य अतिथि तथा अशोक कुमार पाण्डेय एवं डॉ. शाहिद फरोगी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. शिव प्रकाश दास एवं रामनाथ बेख़बर ने संयुक्त रूप से किया। कवि सम्मेलन के प्रारंभ में सुप्रसिद्ध शायर बशीर बद्र तथा स्थानीय साहित्यकार राजकमल सारथी के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर श्रद्धांजलि अर्पित की गई तथा उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई।
इस अवसर पर डॉ. अजय कुमार वर्मा, अनुज रजक, हरेन्द्र यादव, रोहन राजभर, समीर राजवंशी, अर्चित यादव, रूपेश यादव, पूजा लाहेरी, संजू शर्मा, नेहा साव, निधि यादव, स्नेहा कुमारी साव, विशाल यादव, अजय मंडल, संजू माइती, सुग्रीव यादव, राज राय, सुमित महतो एवं चर्चित यादव सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। कवियों ने प्रकृति, पर्यावरण संरक्षण, जल-संकट, वृक्षारोपण तथा जैव-विविधता जैसे विषयों पर अपनी भावपूर्ण रचनाएँ प्रस्तुत कर श्रोताओं को पर्यावरण के प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया। रामनाथ बेख़बर ने अपनी कविता “हँसते हैं पेड़, तब भी हँसते हैं, जब इनकी शाखों पर चिड़ियाँ आती हैं, बसेरा बसाती हैं, चहक-चहक कर गाती हैं, और फिर नील गगन में फुर्र से उड़ जाती हैं” द्वारा वृक्षों और पक्षियों के आत्मीय संबंध पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि रणजीत भारती ने “बादल-बादल बरसा पानी, सबका मन हर्षाए, कोई परिंदा इस धरती पर प्यासा न रह जाए” द्वारा जल संरक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए जीव-जगत के प्रति संवेदना व्यक्त की।
कार्यक्रम अध्यक्ष शंकर रावत ने ग्रामीण जीवन की सादगी और सौंदर्य का चित्रण करती हुई “दोपहरी में पीपल की छाँव, नीम तले झिलमिल ठाँव। तेरी आँखों में ग़ज़ल बन, हम बैठे नित तेरे गाँव” रचना सुनाई। अर्चित यादव ने पर्यावरणीय असंतुलन एवं प्रकृति के क्षरण की पीड़ा को स्वर देते हुए कहा—“आँगन के पंछी ना जाने कब के छोड़ चुके हैं आँगन। झर चुकी हैं बरगद की पत्तियाँ, सूख गई हैं उसकी डालियाँ; धीरे-धीरे मर रहा है बरगद।” राम पुकार सिंह ‘गाजीपुरी’ ने सावन की मनोहारी छटा पर गीत सुनाया। कहा “कोई गाता है कजरी तो कोई मल्हार सावन में, कहीं कोयल भी कुहूके बैठ कोई डार सावन में।” शिवम तिवारी ने पर्यावरण संरक्षण की विडंबना को रेखांकित करते हुए कहा—“पेड़ कटते जा रहे हैं, किताबें छपती जा रही हैं, और उन सारी किताबों में पेड़ लगाने और बचाने की बातों पर ज़ोर डाला जा रहा है।” डॉ. शिव प्रकाश दास ने प्रकृति और स्त्री के मातृरूप को नमन करते हुए स्त्री-विमर्श पर आधारित अपनी कविता में कहा—“मैं स्त्री हूँ, मेरे हिस्से में आई है चौखट, मेरे लिए ही बनी हैं दीवारें। मैंने सदियों को यहीं से जिया है, क्योंकि मैं स्त्री हूँ।”
संजीव कुमार दुबे ने ‘घर’ शीर्षक कविता में आधुनिक पारिवारिक विडंबनाओं को व्यक्त करते हुए कहा—“समस्या यह थी कि ये छवि-घर, घर के हर सदस्य से मिलते कम, टकराते ज़्यादा थे। इसलिए एक घर में रहते हुए भी सब पूरे कम, आधे-अधूरे ज़्यादा थे।” दिवंगत साहित्यकारों को स्मरण करते हुए डॉ. अजय कुमार वर्मा ने श्रद्धांजलि स्वरूप अपनी पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं— “श्रद्धा-सुमन तुम्हें अर्पण, तुम जहाँ भी रहो, जिस जहाँ में रहो, खिलता ही रहे उस जहाँ का चमन।” विशिष्ट अतिथि अशोक कुमार पाण्डेय की व्यंग्यात्मक रचना “पॉकेट से निकलल दस टकिया, खड़ा हो गइल सबके खटिया” पर खूब तालियाँ बजीं। कार्यक्रम का सीधा प्रसारण शब्दवीणा के केन्द्रीय फेसबुक पेज से किया गया, जिससे देश के विभिन्न राज्यों के साहित्यप्रेमी ऑनलाइन जुड़कर काव्यपाठ का आनंद ले सके। संजीव कुमार दुबे ने सभी अतिथियों, कवियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। शब्दवीणा की राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रश्मि प्रियदर्शनी ने बतलाया कि साहित्यिक ऊर्जा और पर्यावरण चेतना के सुंदर सामंजस्य से विभूषित यह आयोजन उपस्थित जनसमूह के लिए प्रेरणादायी, ज्ञानवर्धक एवं स्मरणीय सिद्ध हुआ।
