*शब्दवीणा के ‘चहुँदिश गरमी ही गरमी’ राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में देश के 15 प्रदेशों के रचनाकारों ने पढ़ीं कविताएँ*

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*-लहक रही है धरती सारी, दहक रही ज्वाला-सी धूप*

*-धरा जल रही है, गगन जल रहा है।*

*-गरमी की ऋतु आई लेकर आमों की बहार*

*नदियाँ सूखीं जल भरी, हिरण खड़े बेचैन। छलके कब काली घटा, प्यासे सबके नैन*

*-मौसमों से पार पाना जानता हूँ दोस्तों*

*-तपता सूरज, तपती धरती, तपता आसमान, गौरैया परेशान।*

गया जी। राष्ट्रीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘शब्दवीणा’ की महाराष्ट्र प्रदेश समिति द्वारा देश भर में पड़ रही भीषण गर्मी को काव्य पाठ का मूल विषय बनाते हुए राष्ट्रीय कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। कवि सम्मेलन में शब्दवीणा की पन्द्रह प्रदेश समितियों के कवि एवं कवयित्रियों ने भाग लिया। रचनाकारों ने निर्दिष्ट विषय ‘चहुँदिश गरमी ही गरमी’ पर एक से बढ़कर एक स्वरचित गीत, गज़ल, दोहे, एवं मुक्तकों का पाठ किया। कार्यक्रम का शुभारंभ जागृति सिन्हा द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना “हे माँ शारदे, वीणावादिनी”, तथा शब्दवीणा की संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. डॉ. रश्मि प्रियदर्शनी द्वारा प्रस्तुत शब्दवीणा गीत की सुमधुर प्रस्तुति से हुआ। बतौर मुख्य अतिथि महाराष्ट्र के वरिष्ठ कवि डॉ कृपाशंकर मिश्र रहे, तो बतौर विशिष्ट अतिथि शब्दवीणा के राष्ट्रीय सचिव महावीर सिंह वीर की उपस्थिति रही। कार्यक्रम की अध्यक्षता शब्दवीणा महाराष्ट्र प्रदेश संरक्षक प्रो. डॉ कनक लता तिवारी ने की। संचालन शब्दवीणा की महाराष्ट्र प्रदेश संगठन मंत्री लक्ष्मी यादव ओजस्विनी ने किया।

कवि सम्मेलन में बिहार से डॉ रश्मि प्रियदर्शनी, जैनेन्द्र कुमार मालवीय, बाल कवि सत्कृत त्रिपाठी, एवं अजय वैद्य, पश्चिम बंगाल से राम नाथ बेख़बर, देवघर, झारखंड से बबन बदिया, महाराष्ट्र से डॉ कनक लता तिवारी, डॉ कृपा शंकर मिश्र, लक्ष्मी यादव ओजस्विनी एवं जागृति सिन्हा, मध्य प्रदेश से अरुण अपेक्षित, उत्तराखंड से महावीर सिंह वीर, उत्तर प्रदेश से राम देव शर्मा राही एवं मुल्कराज आकाश, हरियाणा से सरोज कुमार, दिल्ली से आशा दिनकर, कर्नाटक से सुनीता सैनी गुड्डी, विजयेन्द्र सैनी एवं निगम राज़ ने कवि सम्मेलन में जीवन तथा प्रकृति पर पड़ने वाले चिलचिलाती गर्मी एवं लू के प्रभावों का भावपूर्ण, चित्रात्मक, व बिंबात्मक वर्णन करती हुईं जीवंत रचनाएँ पढ़ीं। कवियों ने प्राकृतिक असंतुलन, मौसम के रौद्र होते स्वरूप, एवं जलवायु परिवर्तन की समस्या पर चिंता जताते हुए प्रकृति का अनावश्यक दोहन न करने का संदेश दिया।

डॉ कनक लता तिवारी की “गरमी की ऋतु आई लेकर, आमों की बहार”, डॉ कृपाशंकर मिश्र की “क्यारियों के सुमन सब हैं मुरझा गए, अब भ्रमर कोई उपवन में आता नहीं”, अरुण अपेक्षित की “नदिया सूखीं जल भरी, हिरण खड़े बेचैन। छलके कब काली घटा, प्यासे सबके नैन”, सरोज कुमार की “तपता सूरज, तपती धरती, तपता आसमान। गौरैया परेशान”, जैनेन्द्र कु. मालवीय की “धरती के अधरों पर दरार है, व्याकुल, प्यासा हर प्राणी है”, अजय कुमार की “बिना तपे ना कुछ भी संभव, प्रकृति हरपल कहती है” ने जीव-जंतुओं पर भीषण गर्मी के पड़ने वाले दुष्प्रभावों का सचित्र वर्णन किया। महावीर सिंह वीर ने अपने अनोखे अंदाज़ में जब “किसका कैसा है निशाना जानता हूँ दोस्तों। मौसमों से पार पाना जानता हूँ दोस्तों। बादलों की बेवफाई का मुझे कुछ ग़म नहीं। हौसला मेरा किसी चट्टान से भी कम नहीं। तीश्नगी अपनी दबाना जानता हूँ दोस्तों” गीत सुनाया, तो शब्दवीणा का मंच वाहवाहियों से गूंज उठा। डॉ रश्मि प्रियदर्शनी ने अपनी रचना “धरा जल रही है, गगन जल रहा है। धधकता है सूरज, चमन जल रहा है”, “लहक रही है धरती सारी, दहक रही ज्वाला-सी धूप’ व “गर्म हवाएँ, गर्म फिजाएँ, चहुँदिश गरमी ही गरमी, नभ से मानो बरस रहे हों शोले साँसे थमी-थमी” द्वारा गर्मी की तपिश का सुमधुर शब्दचित्र प्रस्तुत किया। अपने गीत के द्वारा वर्षा रानी का आह्वान किया।

सुनीता सैनी, विजयेन्द्र सैनी, निगम राज़, बबन बदिया एवं मुल्क राज आकाश के गीत़ों ने, तो रामनाथ बेख़बर एवं रामदेव शर्मा राही की बेहतरीन ग़ज़लों ने समां बांध डाला। आशा दिनकर, जैनेन्द्र कुमार मालवीय एवं लक्ष्मी यादव ओजस्विनी की प्रस्तुति को खूब सराहना मिली। कवि सम्मेलन में बाल कवि सत्कृत त्रिपाठी ने तोतली बोली में ओज भरी रचना पढ़कर सबका मन मोह लिया। कार्यक्रम का समापन शांति पाठ से हुआ। धन्यवाद ज्ञापन जागृति सिन्हा ने किया। कवि सम्मेलन का सीधा प्रसारण शब्दवीणा केन्द्रीय पेज से किया गया, जिससे जुड़कर आशा साहनी, प्यारचन्द कुमार मोहन, प्रो. सुनील कुमार उपाध्याय, सुरेश विद्यार्थी, डॉ. रवि प्रकाश, डॉ परशुराम तिवारी भार्गव, श्रवण सहस्त्रांशु, अनुराग सैनी मुकुंद, मधु वशिष्ठ, अशोक राय वत्स, नंद किशोर जोशी, सीमा कल्याण, संतोष कुमार जयंत, आर पी सिंह सहित अनेक साहित्यानुरागियों ने अपनी टिप्पणियों द्वारा रचनाकारों का उत्साह बढ़ाया।

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