परम गुरु ‘ज्ञानरूप’ होकर शिष्य के हर संकट को ‘हर’ लेतेः भारती
देहरादून। प्रत्येक रविवार की भांति आज भी दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा अपने निरंजनपुर स्थित आश्रम सभागार में साप्ताहिक सत्संग-प्रवचनों एवं मधुर भजन-संर्कीतन के कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मंचासीन संगीतज्ञों द्वारा गाए गए अप्रतिम भजनों की श्रंखला के द्वारा कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। भजनों में निहित गूढ़ आध्यात्मिक तथ्यों की विवेचना करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि जब भी मनुष्य संतों-महापुरूषों का संग करता है, उनकी दिव्य सोहबत में समय गुजारता है, तब! उसका विवेक जाग्रत होता है। जाग्रत विवेक मानव को ‘सर्वश्रेष्ठ’ की अनुभूति कराते हुए ‘परम उपलब्धि’ की तरफ उसे अग्रसर किया करता है। मनुष्य का मन असंख्य उलझी हुई गुत्थियों का विशाल समूह है, इसमें उलझ-उलझ कर मनुष्य जन्मों-जन्मांतरों तक अपने परम लक्ष्य परमात्मा से विस्मृत रहते हुए मात्र इसी मन के मुताबिक चलता रहता है, और फिर।
अपने लिए ‘चैरासी’ का कष्टकारी चक्र तैयार कर लेता है। सत्संग का प्रावधान महापुरूषों द्वारा किया गया समूची मानवता पर एक असीम उपकार है। सत्संग द्वारा ही मानव मन की दिशा को ‘ईश्वरोन्मुख’ किया जा सकता है इसी से, जीव को उसका सर्वश्रेष्ठ दिया जा सकता है। साधु के संग की महिमा कबीर साहब कुछ इस प्रकार से बयां करते हैं- ‘कबीरा संगत साध की, सांई आवे याद, लेखे में सोई घड़ी, बाकी दिन बरबाद।’ गुण के संबंध में यदि देखा जाए तो केवल वह ‘परम सत्ता’ ही इस योग्य होती है जो कि अपने सानिध्य में आने वालों के भीतर भी अपने परम श्रेष्ठ गणों की स्थापना कर देती है, एैसी गुणवान परमसत्ता को ही शास्त्र श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ परमगुरू कहकर अभिवंदित किया करते हैं। कबीर साहब यहां भी फरमाते हैं- ‘सब धरती कागद करूं, लेखनि सब वनराय, सात समुंद की मसि करूं, गुरू गुण लिखा न जाए।’ पूर्ण गुरू जीव को वह अद्वितीय सौगात प्रदान करते हैं जिसे केवल और केवल पूर्ण गुरू ही प्रदान करने में सक्षम हुआ करते हैं, वह सौगात है जीव को ‘दिव्य दृष्टि’ प्रदान कर देना। इसी दिव्य दृष्टि के द्वारा ईश्वर के तत्वरूप का दर्शन जीव अपने ‘हृदयस्थल’ में ही किया करता है।
आज के साप्ताहिक कार्यक्रम में सदगुरू श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी स्मिता भारती जी ने प्रवचन करते हुए संगत को बताया कि मानव जीवन में आने वाले सुख और दुख दोनों ही एक दूसरे के ‘पूरक’ हुआ करते हैं, एक शिष्य का अपने गुरू से यह प्रश्न हो सकता है कि सुख के साथ-साथ आखिरकार दुख का प्रार्दुभाव क्यों होता है? तब श्री गुरूदेव ये ही समझाते हैं कि जिस प्रकार नाव को खेने के लिए दोनों चप्पुओं का होना आवश्यक है, क्योंकि! तभी नाव के सफर को पूर्ण कर उसकी यात्रा का अनन्द लिया जा सकता है। एैसे ही संसार में मनुष्यों को यदि सुख ही सुख बना रहता तो मनुष्य प्रमादी होकर अपने मनुष्य जीवन का लक्ष्य ही भूल जाता, और यदि दुख ही दुख बना रहता तो उसका जीवित रह पाना दूभर हो जाता, जीवन नीरस हो जाता, इसीलिए यह दोनों ही मनुष्य रूपी नौका के सफर के लिए आवश्यक हो जाते हैं। कार्यक्रम के समापन पर सदगुरू महाराज जी की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की संयोजिका साध्वी विदुषी अरूणिमा भारती जी ने संगत का आह्वान किया कि दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, देहरादून द्वारा दिनांक 10 जुलाई 2025 को ‘विशाल स्तर’ पर ‘‘श्री गुरू पूर्णिमा महोत्सव’’ का भव्य आयोजन जानकी फार्म हाऊस, बड़ोंवाला में किया जा रहा है। सभी भक्तों-साधकों के साथ-साथ उन्होंने समस्त क्षेत्रवासियों को इस ‘विलक्षण’ कार्यक्रम में सादर आमंत्रित किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ उक्त दिवस प्रातः 08ः30 बजे दिव्य ज्योति वेद मंदिर के वेदपाठियों द्वारा पवित्र वेदमंत्रों के सामूहिक गायन के साथ किया जाएगा। प्रसाद का वितरण करते हुए साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।
