बुड्ढा होगा तेरा बाप!

कंडक्टर को कड़वा जवाब दिया, "बुड्ढा होगा तू, बुड्ढा होगा तेरा बाप, बुड्ढा होगा तेरा खानदान" वृद्धा द्वारा किए गए इस मुकाबले ने ठंड में लिपटे, सुस्त माहौल में नई ऊर्जा का संचार कर दिया।

बुड्ढा होगा तेरा बाप!

‌‌‌सोल ऑफ इंडिया

बस रुड़की में मिलिट्री हॉस्पिटल के सामने खड़ी थी और यहां से इसे 30 किमी दूर लक्सर जाना था, जो कि उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर एक महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन है। रविवार होने के कारण सवारियां कम थी। कंडक्टर-ड्राइवर, दोनों समवेत स्वर में लक्सर-लक्सर की रट लगा रहे थे। मैं इन बसों का नियमित यात्री नहीं हूं। कभी-कभार वाला गुरिल्ला-मुसाफिर हूँ। ये बसें पूरे इत्मीनान के साथ, लगभग रेंगते हुए मंजिल तक पहुँचती हैं। इनमें बहुत धैर्यवान सवारी ही सहजता से यात्रा कर पाती है।
मेरे साथ सीट पर एक बूढ़ी महिला मौजूद थी, जो इतनी बूढ़ी थीं कि उसकी तुलना किसी ओर से करना मुश्किल लगा। उसके चेहरे पर झुर्रियों की रेखाएं इतनी गहरी हो गई थी कि उन्हें साफ-साफ गिना जा सकता था। झुर्रियों के बीच में आंखें किसी बटन की तरह दिख रही थी, जिन्हें वह मिचमिचाती हुई-सी खोलती और बंद करती थी। सहारा लेने के लिए उसे सीट पर लगे हैंडल की बजाय अपनी लाठी पर ज्यादा भरोसा था। एक पुराना थैला इस तरह से उसके पेट के साथ चिपका हुआ था, मानो वह शरीर का कोई अनिवार्य अंग हो। 
वो अबूझ-से शब्दों में कंडक्टर पर बिगड़ रही थी क्योंकि उसके लिहाज से बस को इस जगह रुके हुए काफी देर हो गई थी। कंडक्टर ने झल्लाहट में कहा, "बुढ़िया चैन धर लै, बस नै सिर पै ना ठावै।" कंडक्टर की बात वृद्धा को बेहद चुभ गई। उसने अपनी सारी सामर्थ जुटाकर कंडक्टर को कड़वा जवाब दिया, "बुड्ढा होगा तू, बुड्ढा होगा तेरा बाप, बुड्ढा होगा तेरा खानदान" वृद्धा द्वारा किए गए इस मुकाबले ने ठंड में लिपटे, सुस्त माहौल में नई ऊर्जा का संचार कर दिया। 
बराबर वाली सीट पर बैठी दो पढ़ी-लिखी भद्र महिलाएं, भी वृद्धा की तरफ आकर्षित हुईं। ये दोनों कुछ देर पहले तक इस बात पर चर्चा कर रही थी कि सेलेबस में मौजूद पॉलीटिकल थिंकर्स के नाम आसानी से याद हो जाते हैं, जबकि सोशल थिंकर्स के नाम मुश्किल से जबान पर चढ़ते हैं, वे अपनी बातचीत में कुछ थिंकर्स के नाम लेकर एक-दूसरे को प्रभावित करने की कोशिश भी कर रही थी ताकि यह साबित हो कि उनमें से कोई भी दूसरे के मुकाबले कम ज्ञानवान नहीं है। मैं ठीक से अनुमान तो नहीं लगा पाया, लेकिन उनमें से ही किसी एक महिला ने तीखी गंध वाला परफ्यूम लगाया हुआ था। जैसे ही मेरे नथुनों से गंध टकराई तो छींक के रूप में पहली प्रतिक्रिया सामने आई। दोनों महिलाओं ने एक साथ मेरी तरफ देखा,उन्हें मेरा छींकना नागवार गुजरा। हालांकि मेरे मुंह पर मास्क लगा हुआ था। 
मेरे छींकने पर इन महिलाओं की नाराजगी उस वक्त थोड़ी कम हुई जब इन्होंने वृद्ध महिला का रौद्र रूप देखा।कंडक्टर ने उसका मुकाबला करने की बजाय बस से नीचे उतर कर सवारियों को आवाज लगाना बेहतर समझा। कुल मिलाकर 10-12 सवारियां हो गई थी। इस दौरान एक और आदमी सवारियों की इंतजार कर रहा था, जो इसी ठिकाने पर एक ऐसा तेल भेजता है, जिसके बारे में उसका दावा है, इसे लगाने से देह के तमाम तरह के दर्द खत्म हो जाते हैं। वह बताता गया कि चाहे पिटे होने का दर्द हो, पेट का दर्द हो, कमर का दर्द हो, सिर का दर्द हो, बच्चों की पसलियों में दर्द हो, बुढ़ापे का दर्द हो, घुटनों का दर्द हो, जहां-जहां जैसा भी दर्द हो, वहां इस तेल की कुछ बूंदों की मालिश कर लीजिए और अगर आराम ना हो तो अगली बार पैसे वापस ले जाइए। 
वृद्ध महिला ने जैसे ही वाक्य सुना, वह तुरंत लाठी के सहारे खड़ी हो गई और बोली, "तू ठग है, चोर है, जनम-जनम का झूठा है। लोगों के पैसे ठगता है। तीन महीने पहले ये तेल ले गई थी। उससे रत्ती भर फायदा नहीं हुआ। अब मेरे पैसे लौटा दे।" अचानक हुए हमले से तेल विक्रेता घबरा गया और बचाव में उसने इतना ही कहा कि वो इस महिला को नहीं जानता और ना ही उसे कभी तेल बेचा है। उसने फिर अपने तेल के गुण बताने शुरू किए कि देश के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर सम्राट ने इस तेल को ईजाद किया है। सवारियों का यकीन जमाने के लिए उसने बताया कि जगह-जगह दीवारों पर डॉ सम्राट दवाखाने का प्रचार भी देख सकते हैं। उसने इस तेल के दिव्य गुणों का बखान करने के लिए यह तक कहा, "अगर मैं झूठ बोल रहा हूं तो अल्लाह मुझे दोजख में डाले।"
वृद्धा फिर बीच में कूद पड़ी और उसने ऐलान किया कि तू दोजख में जाने लायक ही है। तेल बेचने वाले ने यह कहकर इस समस्या का तात्कालिक हल निकाला कि तुम अपनी खाली सीसी लेकर आओ फिर मैं 50 रुपये वापस करूंगा। खैर, तब तक बस के चलने का वक्त हो गया था। इन सवारियों में से किसी ने भी इस जादुई तेल में रुचि नहीं दिखाई। तेल बेचने वाले ने इसके लिए बुढ़िया को गुनहगार माना। 
सवारियों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था इसलिए कंडक्टर ने भी बुढ़िया को निशाना बनाते हुए कहा कि आज पैसे निकाल ले, फ्री लेकर नहीं जाऊंगा। 'आज' शब्द से अंदाजा हुआ कि वृद्धा पहले भी इन बसों में यात्रा करती रही होगी। फ्री वाली बात पर बुढ़िया ने फिर जोरदार हमला बोला," फ्री जाए तेरा बाप, फ्री जाए मेरी जूती, फ्री जाए भिखारी, फ्री जाएं लँगड़े-लाचार।" उसने अपनी लाठी से दो-तीन बार बस के फर्श को ठोका और कंडक्टर के हाथ में 20 रुपये थमा दिए। 
सारे घटनाक्रम के बीच दो-तीन बार मन में ख्याल आया कि माहौल को सुधारने के लिए मैं कुछ दखल दूं, लेकिन वृद्धा के रुख को देखकर मेरी हिम्मत नहीं हुई। बस चल पड़ी तो अचानक वृद्धा ने, लगभग सूख चुके अपने हाथों से, मेरा कंधा छुआ और पूछा टाइम कितना हुआ है? मैंने बताया, नौ बजे हैं। फिर अगला सवाल, तुम पढ़ने जाते हो ? मैंने बताया, पढ़ाने जाता हूँ और फिर बुढ़िया बताने लगी कि उसका पोता किस स्कूल में पढ़ता है और वहां की पढ़ाई कितनी अच्छी। अपने परिवार के बारे में उसके पास और भी कई बातें बताने को थीं।
रुड़की कैंट एरिया के पीछे की तरफ एक रेलवे फाटक है, जो खुलता कम देर के लिए है और बंद ज्यादा वक्त तक रहता है। वहां भी बस रुकी रही और वृद्धा मेरे साथ बातों में लगी रही। हालांकि, मेरी भूमिका केवल सुनने भर की थी। उसकी बातों में कोई खास तारतम्यता नहीं थी, लेकिन बताने की चाहत जरूर थी। करीब आधा घण्टा बाद मुझे बस से उतरना था तो बुढ़िया को थोड़ी मायूसी हुई। उसने अपनी लाठी को थोड़ा-सा हटाकर मेरे निकलने का रास्ता बनाया और ताकीद किया कि ध्यान से नीचें उतरूं। कंडक्टर अब भी लक्सर-लक्सर की आवाज लगा रहा है और दोनों भद्र महिलाएं बौद्धिक चर्चा बन्द करके इस रोड पर चलने वाली बसों के घटियापन पर बात कर रही थीं।
मैं ध्यान से उतर तो गया, लेकिन बूढ़ी अम्मा दिन भर मेरे ध्यान में बनी रहीं।
सुशील उपाध्याय