नई शिक्षा नीति-3- टुकड़ों से नहीं बनेगी पूरी तस्वीर, पीएच.डी. उपाधि को लेकर कई पेंच

दस साल पहले हर वर्ष करीब 25 हजार युवा पीएच.डी. उपाधि प्राप्त करते थे, अब यह संख्या करीब 40 हजार प्रतिवर्ष का आंकड़ा छूने जा रही है।

नई शिक्षा नीति-3-  टुकड़ों से नहीं बनेगी पूरी तस्वीर, पीएच.डी. उपाधि को लेकर कई पेंच


इसमें कोई संदेह नहीं है कि नई शिक्षा नीति में रिसर्च पर इतना जोर दिया गया है, जितना पहले कभी नहीं दिया गया, लेकिन इस नीति के करीब डेढ़ साल बाद अकादमिक रिसर्च को लेकर जो कदम उठाए जा रहे हैं, वे बीते वर्षाें की भांति टुकड़ों-टुकड़ों में ही उठाए जा रहे हैं। रिसर्च के संदर्भ में हाल के दिनों के दो निर्णयों से इस बात की पुष्टि होती है कि अकादमिक रिसर्च को लेकर अब भी समग्र और समावेशी दृष्टि का साफ अभाव बना हुआ है।
इस वक्त देश में करीब 1100 सौ संस्थाएं ऐसी हैं जो रिसर्च उपाधि देने के लिए अधिकृत हैं, इनमें केंद्रीय विवि, राज्य विवि, निजी विवि, डीम्ड विवि और आईआईटी, आईआईएससी एवं एनआईटी जैसे राष्ट्रीय महत्त्व के संस्थान शामिल हैं। इन संस्थाओं में निजी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों एवं समकक्ष संस्थानों की हिस्सेदारी करीब 40 फीसद है, जो लगातार बढ़ रही है। बीते दस सालों को देखें तो देश में विश्वविद्यालयों और अन्य समकक्ष संस्थाओं में करीब 7 फीसद के औसत से बढ़ोत्तरी हुई है। इसी अवधि में शोध-उपाधि प्राप्त करने वाले युवाओं का आंकड़ा डेढ़ गुना से ज्यादा हो गया है। दस साल पहले हर वर्ष करीब 25 हजार युवा पीएच.डी. उपाधि प्राप्त करते थे, अब यह संख्या करीब 40 हजार प्रतिवर्ष का आंकड़ा छूने जा रही है। 
इन दोनों तरह के आंकड़ों से साफ है कि पीएच.डी. करने वालों और पीएच.डी. कराने वाली संस्थाओं, दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है। देश में जैसे-जैसे उच्च शिक्षा में नामांकन की दर बढ़ रही है, उसी के हिसाब से शोध-उपाधि प्राप्त करने वालांे की संख्या में बढ़ रही है। इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि आगामी कुछ वर्षाें में विश्वविद्यालयों एवं समकक्ष संस्थाआंे का आंकड़ा 1500 कर जाएगा और हर साल 50 हजार से अधिक युवा शोध-उपाधि प्राप्त कर रहे होंगे। इन दोनों बातों के संकेत नई शिक्षा नीति में साफ-साफ देखे जा सकते हैं। नई नीति में शोध को ग्रेजुएट उपाधि के स्तर से महत्ता दी गई है। चार वर्षीय ग्रेजुएट उपाधि में चौथा वर्ष पूरी तरह शोध पर केंद्रित है। इसी प्रकार पांच वर्षीय इंटीग्रेटिड पोस्ट ग्रेजुएट उपाधि के बाद छठे वर्ष को भी पूरी तरह शोध के लिए रखा गया है।
अब सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या के साथ शोध-उपाधि की गुणवत्ता कैसे कायम रहेगी! ऐसा कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि किसी को शोध गुणवत्ता की फिक्र नहीं है। नई शिक्षा नीति आने से पहले 21 मई, 2019 को यू.जी.सी. ने एक परियोजना का ऐलान किया था, जिसके तहत बीते 10 साल की सभी विषयों की थीसिस के निरीक्षण के आधार पर गुणवत्ता का पता लगाया जाना था। हालांकि, अभी इस मुहिम के निष्कर्ष सामने नहीं आए हैं, लेकिन इस साल दो महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। पहला, सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पीएच.डी. में प्रवेश के लिए नेट उत्तीर्ण होना अनिवार्य होगा और दूसरा सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय शोध उपाधि में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा का आयोजन करेंगे। ये दोनों निर्णय केंद्रीय विश्वविद्यालयों के साथ जुड़े हैं। इसका अर्थ यह है कि अन्य विश्वविद्यालय पूर्ववत प्रवेश देते रहेंगे। 
(वैसे, अभी इन निर्णयों में स्पष्टता की जरूरत है क्योंकि नेट उत्तीर्ण होना अनिवार्य किए जाने पर संयुक्त प्रवेश परीक्षा किसके लिए आयोजित की जाएगी ? हालांकि, इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि नेट उत्तीर्ण होने पर भी प्रवेश परीक्षा में बैठना होगा। यह भी उल्लेखनीय है कि यू.जी.सी. ने 16 अक्तूबर, 2018 को पीएच.डी. में प्रवेश के लिए चयन परीक्षा का 70 प्रतिशत वेटेज निर्धारित किया है। इस आदेश के दृष्टिगत भी प्रवेश परीक्षा अनिवार्य दिखाई देती है।)
अख्ािल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वे यानि एआईएसएचई की नवीनतम रिपोर्ट को देखें तो पता चलता है कि देश में कुल शोध-पंजीकरण में केंद्रीय विश्वविद्यालयों की हिस्सेदारी महज 13.6 प्रतिशत है। यानि सात में से महज एक युवा केंद्रीय विश्वविद्यालय से पीएच.डी. करता है। ऐसे में क्या नए नियम केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक सीमित रखकर शोध के पूरे चेहरे को बदला जा सकता है! इसका जवाब नहीं में है। यह ठीक है कि शिक्षा को संविधान की समवर्ती सूची में रखा गया है यानि शिक्षा को लेकर राज्य अपने नियम बना सकते हैं, लेकिन नियमों, परिनियमों आदि का प्रारंभिक निर्धारण यू.जी.सी. के स्तर पर ही होता है और यू.जी.सी. द्वारा निर्धारित अकादमिक-शैक्षिक नियमों में राज्य सरकारें या राज्य स्तरीय नियामक संस्थाएं भी किसी प्रकार की कमी नहीं कर सकती। (हालांकि, उन्हें इन नियमों को और कड़ा करने या इनमें बढ़ोत्तरी करने का अधिकार होता है।) ऐसे में, अच्छा तो यह होता कि शोध उपाधि संबंधी सभी नियमों को सभी श्रेणी के विश्वविद्यालयों पर लागू किया जाता। यह भी गौरतलब है कि पीएच.डी. उपाधि के संबंध में यू.जी.सी. अपने नियमों को बहुत तेजी से और लगातार बदलती रही है। इस कारण इन नियमों को लागू करने में विश्वविद्यालयों को भी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
देश में इस वक्त जो शोध उपाधियां प्रदान की जा रही हैं, उनमें विगत पांच वर्षाें में निजी विश्वविद्यालयों की उपाधियों की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत हो गई है। यह हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। निजी क्षेत्र में अनेक ऐसे विश्वविद्यालय हैं, जहां रिसर्च उपाधि प्रदान करने की प्रक्रिया और तौर-तरीके कई कारणों से संदिग्ध हैं। ऐसे कुछ प्रकरणों में कई निजी विश्वविद्यालयांे के खिलाफ कार्रवाई भी हुई है। यदि इनके मामले में नेट की अनिवार्यता या फिर संयुक्त प्रवेश परीक्षा की बाध्यता लागू की जाए तो संदिग्ध शोधार्धियों की संख्या में कुछ न कुछ कमी जरूर आएगी। एआईएसएचई के वर्ष 2019-20 के अंाकड़ों के अनुसार, इस वक्त देश में दो लाख से अधिक युवा शोध-उपाधि में पंजीकृत हैं। ऐसे में नियमों की अस्पष्टता, एक साथ कई प्रकार के नियम होना, अलग-अलग संस्थाआंे में भिन्न-भिन्न नियम लागू होना आदि स्थितियों से नई शिक्षा नीति के शोध संबंधी लक्ष्यों को हासिल करना आसान नहीं होगी। और यदि ऐसे ही टुकड़ों में नियम लागू किए गए तो फिर ‘ग्लोबल नॉलेज सुपर पॉवर’ बनने की बात दिवास्वप्न जैसी ही होगी।
सुशील उपाध्याय